पंजाब निकाय चुनाव में तो कांग्रेस ने कम सीटें जीतीं

Posted On:- 2026-05-31




सुनील दास

हर राज्य में निकाय चुनाव होते हैं तो माना जाता है कि उसमें जो सत्तारूढ़ दल है, वही ज्यादा सीटें जीतता है। लेकिन यह भी राज्य का एक अहम चुनाव होता है, हर राजनीतिक दल के लिए निकाय चुनाव अपने जनाधार को जानने व बढ़ाने का मौका होता है। चुनाव परिणाम से यह साफ हो जाता है कि किसी पार्टी के अध्यक्ष,प्रदेश प्रभारी व अन्य नेताओं ने कितनी मेहनत की है।हारने वाले कह सकते हैं कि निकाय चुनाव में तो जनता सत्तारूढ़ दल को ही जिताना पसंद करती है, हम हार गए हैं तो क्या हुआ दूसरे नंबर पर तो हैं यानी जनता जब सत्तारूढ़ दल से नाराज होगी तो वह हमें ही चुनना पसंद करेंगी यानी चुनाव हारना कोई गंभीर बात नहीं है। चुनाव में तो हार जीत होती रहती है। जीतता तो कोई एक ही है। पंजाब निकाय चुनाव में आप ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर साबित किया है कि जनता उसके राजकाज से संतुष्ट है।

वैसे तो छत्तीसगढ़ के नेताओं के लिए पंजाब निकाय चुनाव में कोई खास नहीं है जैसे अऩ्य राज्यों के चुनाव होते है वैसे ही पंजाब के निकाय चुनाव हुए है लेकिन कुछ लोगों को इसमें इसलिए दिलचस्पी है कि पंजाब के प्रदेश प्रभारी छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल हैं।भूपेश बघेल को कांग्रेस आलाकमान कहीं भी चुनाव पर्यवेक्षक या प्रदेश प्रभारी बनाकर भेजता है तो राज्य के लोगों को उस प्रदेश के चुनाव परिणाम का इंतजार रहता है कि भूपेश बघेल को उस प्रदेश का पर्यवेक्षक बनाने या प्रदेश प्रभारी बनाने का परिणाम क्या रहा। क्या आलाकमान ने उनको जिस अपेक्षा के साथ पर्यवेक्षक बनाया था या प्रदेश प्रभारी बनाया था,उस अपेक्षा की कसौटी पर भूपेश बघेल खरे उतरे हैं या खरे नहीं उतरे हैं। पंजाब में भूपेश बघेल को प्रदेश प्रभारी बनाने पर उन्होंने कोई कमाल निकाय चुनाव में किया है क्या।

पंजाब निकाय चुनाव के परिणाम के कई मायने निकाले जा सकते हैं।एक सीधा सा मतलब तो यह निकाला जा सकता है कि इस बार निकाय चुनाव में पंजाब के लोगों ने सत्तारूढ़ सरकार को जिताकर साफ कर दिया है कि राज्य के विकास के लिए डबल इंजन की सरकार जरूरी है। यानी हमेशा की तरह जनता ने सत्तारूढ़ दल को निकाय चुनाव में भी जिताकर साफ कर दिया है कि दूसरों को जिताने का कोई मतलब नहीं है। सत्तारूढ़ दल को जिताने पर निकायों का तेजी से विकास होगा। निकाय चुनाव में किस दल के कितने प्रत्याशी जीते है, इससे भी संकेत मिलता है कि अगले विधानसभा चुनाव का परिणाम क्या हो सकता है।चुनाव में आप को तो बढ़त मिलनी ही थी, मिली भी और इस आधार पर कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में भी पलड़ा तो आप का ही भारी रहने वाला है।

चुनाव परिणाम से यह साफ होता है कि भाजपा जिसका जनाधार पंजाब में कमजोर था, उसने अपने जनाधार को कुछ तो मजबूत किया है। आंकड़ो के हिसाब से देखा जाए तो पिछले निकाय चुनाव में यानी २०२१ के चुनाव में भाजपा को कुल २२१५ सीटों में से ४९ सीटों पर ही जीत मिली थी। इस बार भाजपा ने १९७७ सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे १६७ सीटों पर जीत मिली है यानी कहा जा सकता है कि पिछली बार की तुलना में इस बार भाजपा ने बहुत सीटें ज्यादा जीती हैं। आठ नगरनिगमों से दो में भाजपा ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है।भाजपा की तुलना में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक माना जा रहा है। शिरोमणि अकाली दल व कांग्रेस को निकाय चुनाव में नुकसान हुआ है।दोनों की यहां सरकार कई साल तक रही है,उनका जनाधार है लेकिन चुनाव परिणाम से साफ है कि दोनों का जनाधार कमजोर हुआ है। जनाधार कमजोर होने के कारण सीटों की संख्या भी कम हुई है।

पंजाब का प्रभारी भूपेश बघेल को इस उम्मीद में ही बनाया गया था कि वह पंजाब में कांग्रेस को मजबूत कर कोई कमाल करके दिखाएंगे लेेकिन वह कोई कमाल नहीं कर पाए हैं।जैसे छत्तीसगढ़ में उनसे दोबारा चुनाव जिताने की उम्मीद की गई थी लेकिन नहीं जिता पाए वैसे ही पंजाब में भी वह कांग्रेस को निकाय चुनाव में नहीं जिता पाए हैं।२०२१ के निकाय चुनाव में यहां कांग्रेस १४३२ सीटें जीती थीं,जबकि २०२६ के चुनाव मे कांग्रेस ३८४ सीेटें ही जीत पाई हैं। यानी आलाकमान ने भूपेश बघेल को जिस उम्मीद के साथ पंजाब प्रदेश प्रभारी बनाया था, उस उम्मीद को भूपेश बघेल पूरा नहीं कर पाए हैं। यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि इससे पहले भूपेश बघेल को जिन प्रदेशों में चुनाव जिताने के लिए आलाकमान ने भेजा वहां भी भूपेश बघेल कोई कमाल कहां कर पाए थे। चुनाव जिताने की बात हो तो भूपेश बघेल ने कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में एक बार चुनाव जिताया है। उसके बाद उनको छत्तीसगढ़,असम,यूपी,हिमाचल आदि जगह चुनाव जिताने के लिए बडी उम्मीद के साथ भेजा गया था लेकिन हिमाचल को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस जीती नहीं है।कहा जाता है कि आलाकमान तो भूपेश बघेल को कांग्रेस का राष्ट्रीय नेता बनाना चाहते हैं लेकिन भूपेश बघेल राज्य की राजनीति का मोह छोड़ नहीं पाते हैं।एक वजह तो यही है कि वह दूसरे राज्यों में कोई चमत्कार नहीं दिखा पाते हैं।



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