किसी भी देश समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक यथास्थितिवादी होते हैं यानी हर तरह के सुधार के विरोधी। जो यह मानकर चलते हैं कि जो व्यवस्था है, वही अच्छी है। उसमें सुधार की कोई जरूरत नहीं है। जब भी किसी क्षेत्र में कोई सुधार किया जाता है तो यथास्थितिवादी उसका विरोध करते हैं। वह मौके की ताक में रहते हैं कि किसी क्षेत्र में सुधार के बाद भी कोई गड़बड़ी तो हो, वह उस गड़बड़ी को विरोध करते हैं यह साबित करने लग जाते हैं, सुधार के बाद बनी नई व्यवस्था को पुरानी व्यवस्था से भी खराब है। यानी पुरानी व्यवस्था ही बेहतर थी कम से कम ऐसी गड़बड़ी तो नहीं होती थी।हर क्षेत्र में कुछ लोग जो पुरानी व्यवस्था या जो व्यवस्था बनी हुई है उसी के पक्षधर इसलिए होते हैं कि पुरानी व्यवस्था में वह जैसा चाहे वैसा भ्रष्टाचार कर सकते हैं,वह पुरानी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के आदी है और नई व्यवस्था में भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम हो जाती है, इसलिए यथास्थितिवादी सुधार का विरोध करते हैं, हर क्षेत्र में नई तकनीक का विरोध करते हैं ताकि उनका भ्रष्टाचार का धंधा चलता रहे।वह नहीं चाहते हैं कि भ्रष्टाचार कम होना चाहिए। इसलिए हर नई तकनीक का विरोध करते हैं क्योंकि तकनीक से भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम होती जाती है।
२०१४ के पहले कहा जाता था और यह सच भी था कि हम केंद्र से किसी आदमी को एक रुपए भेजते हैं तो उस आदमी तक एक रुपए नहीें १५ पैसे पहुंचते थे।यानी स्वीकार किया जाता था कि केंद्र से जो पैसा राज्यों के लोगों तक भेजा जाता है, उसमें ८५ प्रतिशत भ्रष्टाचार होता है।सब मानते थे,स्वीकार करते थे लेकिन इस व्यवस्था को यथास्थितिवादी बदलने को तैयार नहीं थे, वह मानने को तैयार नहीं थे कि ऐसी कोई व्यवस्था हो सकती है या सुधार हो सकता है कि अनिवार्य रूप से हो रहे ८५ प्रतिशत भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है।सब मानते थे कि यह संभव नहीं है कि केंद्र से एक रुपए राज्यों को भेजा जाए तो लोगों को एक रूपए ही मिले। सब मानते थे कि कोई उपाय नहीं है लेकिन नई तकनीक आने के बाद ऐसा आज संभव हुआ है कि केंद्र एक रुपए राज्य के लाखों के खाते में भेजे तो कुछ मिनट में रुपए उसके खाते में पहुंच जाता है।यह इसलिए संभव हुआ है कि तकनीक के कारण केंद्र व राज्य के बीच जो विभिन्न पदों पर बैठे हुए आदमी थे और ८५ प्रतिशत भ्रष्टाचार करते थे,तकनीक के चलते उनकी जरूरत नहीं रही। यानी राज्य व केंद्र के बीच आदमियों की एक लंबी श्रृंखला है, वह जब तक है,भ्रष्टाचार को रोका नहीं जा सकता क्योंकि आदमी ही तो भ्रष्टाचार करता है,
किसी भी सिस्टम में जब तक आदमी है,भ्रष्टाचार की गुंजाइश तो बनी ही रहेगी।किसी सिस्टम में मान लो १०० आदमी हैं और इनमें ९० ईमानदार है और दस बेईमान हैं तो दस प्रतिशत भ्रष्टाचार तो होगा ही। कोई यह नहीं देखेगा कि ९० लोग ईमानदार है सब यही देखेंगे कि भ्रष्टाचार हो रहा है यानी सिस्टम ठीक नहीं है।बुरी बात यह है कि ज्यादातर लोग १० प्रतिशत भ्रष्टाचार की बात करते हैं ९० प्रतिशत ईमानदार लोगों की कोई बात नही करता।पेपर लीक यही दस प्रतिशत लोग करते हैं और ९० प्रतिशत लोग सिस्टम को अच्छा बनाए रखने का प्रयास करते हैं लेकिन उनकी कोशिश का कोई मतलब नहीं रह जाता।सब मान लेते हैं कि पूरा सिस्टम ही गलत है।इस आधार पर लोग यह कहने से नहीं चूकते हैं कि सुधार के बाद बनाया गया नया सिस्टम ठीक नहीं है। किसी भी तरह की परीक्षा के लिए बनाया गया सिस्टम ठीक नहीं है क्योंकि पेपर लीक हो रहा है, कई तरह की तकनीकी गड़बड़ी हो रही है।
यह बात तो सही है कि पेपर लीक नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे बड़ी अव्यवस्था फैलती है, लाखों बच्चों,उनके परिजनों को कई तरह की परेशानी होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि नया सिस्टम ही खराब है। पुराना परीक्षा का सिस्टम ही ठीक था। आज का जो नया सिस्टम वह कई सुधारों का परिणाम है। यह हम भूल गए हैं कि एक वक्त था जब बोर्ड की परीक्षा नहीं होती थी,स्कूल की परीक्षा पास कर लेना काफी होता था, बाद में पांचवी,ग्यारहवीं, उसके बाद दसवीं,बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा शुरू हुई यानी परीक्षा का एक सिस्टम बना, यह सिस्टम उस बक्त होने वाले भ्रष्टाचार होने के कारण ही बना था यानी योग्यता का एक पैमाना बनाया गया। राज्य स्तर पर बोर्ड होते थे तो राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार होने लगे। यानी जिस स्तर की परीक्षा होती थी,उस स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ। इसलिए आज केंद्र के स्तर पर जो परीक्षा की व्यवस्था है वह राज्य स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाया गया है।
पहले राज्य स्तर पर परीक्षा होती थी तो राज्य स्तर पर छात्र प्रभावित होते थे इसलिए हल्ला राज्य स्तर पर होता था। आज राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा हो रही है तो भ्रष्टाचार भी राष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा है। इससे पूरे देश में छात्र प्रभावित हो रहे हैं।देश में मेहनतकर पास होने वाले छात्रों की संख्या निश्चित रूप से ज्यादा है, ज्यादातर छात्र व माता पिता चाहते हैं कि उनका बेटा मेहनत कर परीक्षा पास करे।लेकिन कम संख्या में सही ऐसे छात्रों व माता पिता है जो चाहते हैं कि उनका बेटा बिना मेहनत के आसानी से परीक्षा पास कर ले, पेपर लीक इन्हीं लोगों के कारण होता है। यही लोग पेपर लीक लाखों रुपए देकर कराते हैं और पेपर लीक कराने के लाखों रुपए मिलते हैं ,इसलिए पेपर सेट करने वालों से लेकर पेपर केंद्रों में खोलनेवाला तक पैसे के लिए पेपर लीक करने तैयार हो जाते हैं।कोचिंग माफिया का इसमें बडा रोल होता है यानी पेपर लीक की मांग है तो पेपर लीक कराया जा रहा है। पेपर लीक रोकने के लिए भी सरकार को तकनीक का सहारा लेना पड़ेगा। पेपर लीक तकनीक के कारण आसान हो गया है तो पेपर लीक को तकनीक के जरिए ही रोकने का काम करना होगा।
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