कई बार जो जैसा दिखता है,वह वाकई में वैसा नहीं होता है।सोशल मीडिया में काकरोच जनता पार्टी के सदस्य या फालोवर की संख्या तो ढाई करोड़ बताई गई, इससे ऐसा नरेटिव बनाया गया कि मोदी सरकार के खिलाफ कोई बहुत बड़ा आंदोलन शुरू हो गया है और यह आंदोलन ऐसा होगा कि मोदी सरकार को सत्ता छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा। जब तक यह आंदोलन सोशल मीडिया तक सीमित रहा लोगों को लगता रहा कि वाकई में देश के युवाओं में मोदी सरकार को लेकर बहुत गुस्सा है और देश का जेन जी जल्द ही सड़क पर उतरेगा और मोदी सरकार का हश्र भी बांग्लादेश,नेपाल व श्रीलंका की सरकारों जैसा होगा।विपक्ष के नेता भी शुरू में खुश थे कि चलो युवा अब काकरोच जनता पार्टी के माध्यम से अपनी नाराजगी जताने सड़कों पर उतरेंगे और मोदी सरकार के खिलाफ जो काम वह १२ सालों में नहीं कर सके वह काम आसानी से काकरोच जनता पार्टी करेगी।
काकरोच जनता पार्टी का जन्म ही डिजिटली हुआ है। उसका गठन जमीन पर परंपरागत राजनीतिक दलों की तरह नहीं हुआ है।इसलिए यह कितना हकीकत है और कितना फसाना है, इसका पता शुरू में लगना मुश्किल था इसलिए हर फसाने की तरह इस फसाने की चर्चा तो बहुत हुई। कहने वालाें ने क्या नहीं कहा-यह न तो पार्टी है, यह न तो जनता है, यह न तो दूसरे आंदोलनों की तरह आंदोलन है,यह तो एक क्षण है, यह युवाओं के गुस्से की लहर, यह तो गुस्से की सुनामी है,यह तो भारत के जेनजी की लहर है,यह भावनाओं का ज्वार है,यह देश के युवाओं की ऊर्जा का ऐसा महाविस्फोट है जिसमें मोदी सरकार का जाना तय है।यह सोशल मीडिया के आभासी जगत में पैदा हुआ इसलिए इसकी जमीनी हकीकत को किसी को कुछ पता नहीं था सब कुछ दिनों में इसके ढाई करोड़ फालोवरों की बात इस तरह कर रहे कि जब यह ढाई करोड़ काकरोच जमीन पर आएंगे को क्या नहीं हो सकता। सब इंतजार कर रहे थे कि ढाई करोड़ काकरोज कब जमीन पर दिखाई देंगे। इसे तो सब सच मान रहे थे ढाई करोड़ की संख्या बहुत ज्यादा होती है। लेकिन लोगों का यकीन तो तब आता जब ढाई करोड़ काकरोज दिल्ली की जमीन पर दिखाई देते।
काकरोच जनता पार्टी के सुप्रीमो अभिजीत दीपके ने जब यह घोषणा की कि उनकी पार्टी जंतर मंतर पर नीट समेत दूसरी तमाम परीक्षाओं के पेपरलीक मामले में विरोध प्रदर्शन किया जाएगा तो लोगों को लगा अब आया है मौका काकरोच पार्टी की हकीकत जानने का। ढाई करोड फालोवर होने की वजह सब यह उम्मीद कर रहे थे कि दिल्ली में आज तक जैसा आँदोलन नहीं हुआ वैसा आंदोलन काकरोच जनता पार्टी करके दिखाएगी। लोग कम से कम उम्मीद कर रहे थे कि कम से कम पांच दस लाख तो इस आंदोलन में जुटेंगे ही लेकिन ऐसा नहीं हुआ और काकरोज जनता पार्टी की पोल खुल गई जब गिनती के एक दो हजार ही लोग जंतर मंतर पर पहुंचे।यहा भीड़ का नजारा इसलिए दिख रहा था कि हजार पंद्रह सौ पुलिस वाले ही थे, कुछ सौ पत्रकार व यूट्यूबर थे, वैसे भी जंतर मंतर शनिवार इतवार को सौ दो सौ लोग रहते ही हैं।
यानी डिजिडल मीडिया में जो करोड़ो की बात की जा रही थी वह जमीन पर दो हजार तक सिमट कर रह गई। ऐतिहासिक प्रदर्शन एक सामान्य प्रदर्शन जैसा रहा। आंदोलन करने वाले सोच रहे थे कि उनको आंदोलन की अनुमति नहीं मिलेगी तो उनको शक्ति प्रदर्शन का मौका मिलेगा लेकिन पुलिस ने आसानी से आंदोलन की अनुमति दे दी की जाओ जितनी ताकत दिखानी है जंतरमंतर पर दिखाओ। काकरोच जनता पार्टी के पास ताकत तो आभासी दुनिया में थी। जमीन पर तो उनके पास हजार दो हजार लोगों का ताकत थी। इसे ताकत कौन मानेगा कौन मानेगा कि यह काकरोच पार्टी इस देश में युवाओं के भले के लिए कुछ कर सकती है।काकरोच और उनके नेताओं को लगा कि पहला इंप्रेशन तो ठीक से पड़ा नहीं तो क्या हुआ।अगले प्रदर्शन की चेतावनी सरकार को दे कर गए हैं कि केंद्रीय मंत्री को सात दिन में नही हटाया तो अगले शनिवार को इसके विरोध में काकरोच जनता पार्टी फिर प्रदर्शन करेगी।
अब किसी को यकीन नहीं है कि यह काकरोच पार्टी कुछ कर सकती है क्योंकि कुछ दिनों में ही देश के राजनीतिक दलों को समझ आ गया है कि हम तो इसे शक्तिमान समझ रहे थे यह तो उसी झाड़ूवाले का चेला है।जैसे ही पता चला काकरोच झाड़ू का बदला हुआ रूप है। देश के विपक्षी दल दो हिस्सों में बंट गए एक जो इसका समर्थन कर रहे हैं और कांग्रेस इसका विरोध कर रही है. इसका मजाक उड़ा रही है।क्योंकि कांग्रेस के लिए सबसे बड़े नेता राहुल गांधी है, उनसे बडा नेता किसी को नहीं मान सकते। राहुल गांधी भी तो युवाओं के गुस्से का उपयोग कर खुद युवाओं का बड़ा नेता बनना चाहते है और काकरोच पार्टी ने ऐन मौके पर अभिजीत दीपके के रूप में एक नेता सामने खड़ा कर दिया है और युवाओं से कहा जा रहा है कि यह युवाओं का नेता है.यही युवाओं का भला कर सकता है, यह बात कांग्रेस को भली लग नहीं सकती कि उनके युवा नेता के सामने कोई दूसरा युवा नेता खड़ा हो। कांग्रेस चाहती थी यह आंदोलन सफल न हो और ऐसा ही हुआ है। इसका मतलब यह नहीं है कि राहुल गांधी के लिए पूरा मैदान खाली है।झाड़ू वाला दिल्ली के मैदान नहीं है इसका मतलब यह नहीं है कि कोई दिल्ली के मैदान पर कब्जा कर लेगा।झाड़ू वाला दिल्ली के मैदान में न हो कर भी दिल्ली के मैदान में है,वह नए रूप में है।नए अवतार में है।
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