सुरक्षा की जरूरत तो तब जायज मानी जाती है जब उच्च पदों पर बैठे हुए लोगों की जान जाने का खतरा होता है,उन पर कभी भी हमला होने का खतरा होता है।जब तक छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद था,तब तक तो नेताओं की सुरक्षा जरूरी थी,यह बात लोगों को समझ आती है कि लेकिन नक्सलियों के सफाए के बाद बस्तर सहित अन्य क्षेत्र के नेताओं की अब खास जरूरत नहीं है क्योंकि जिनसे बस्तर के नेताओं सहित अन्य लोगों का जान का खतरा था, उनका तो सफाया कर दिया गया है यानी हमला करने वाले,जान लेने वाले अब नहीं बचे हैं तो नेताओं को किससे खतरा है।यह तय समय मार्च-२६ तक नक्सलियों का सफाया कर दिया गया है।इसके बाद छह माह हो गए है यह जानने के लिए कि बस्तर के नेताओं सहित अऩ्य नेताओं की सुरक्षा की जरूरत है क्या। है तो कितनी है।
नेताओं की सुरक्षा यूं ही नहीं हो जाती है, उसमें करोड़ों रुपए खर्च होते हैं।जब तक जरूरी था करोड़ो रुपए खर्च किए जाते थे अब होना यह चाहिए कि सुरक्षा को खत्म किया जाना चाहिए और जो करोड़ो रुपए सुरक्षा के नाम पर खर्च हो रहे हैं,उनका राज्य के विकास में सदुपयोग करना चाहिए।साय सरकार ने छह माह देखने के बाद अब नेताओं की सुरक्षा के नाम पर जो खर्च हो रहा था, उसमें कटौती शुरू कर दी है।साय सरकार चाहती तो सुरक्षा छह माह बाद समाप्त भी कर सकती थी लेकिन उसमें छह माह बाद थोड़ी से कटौती की है। अब छह माह और देखा जाएगा उसके बाद और कटौती की जाएगी,इससे ऐसा लगता है कि साय सरकार नेताओं की सुरक्षा में एकदम से कटौती नहीं करना चाहती है।वह धीरे धीरे कटौती करना चाहती ताकि पक्ष और विपक्ष के सुरक्षा प्राप्त नेता नाराज न हों।
आंकड़ों के मुताबिक नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी ४०० नेताओं की वीआईपी सुरक्षा में १५५० पुलिस कर्मी तैनात हैं।छह माह की समीक्षा के बाद सीेेएम साय ने नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर ४० नेताओं की वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था हटाने का आदेश दिया है।५० से अधिक नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था कैटेगरी को कम किया गया है।अभी तक ११ नेताओं के पास जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था थी,अब केवल सीएम व राज्यपाल के लिए ही जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था रहेगी।बस्तर के केदार कश्यप,महेश गागड़ा.दीपक बैज,महेंद्र कर्मा के परिवारजनों की सुरक्षा को जेड कर दिया गया है।इससे पुलिस को २०० जवान वापस मिल जाएंगे।सीएम के आदेश पर जिन ४० नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था हटाई गई है,उसमे बस्तर के सरपंच,मंडल अध्यक्ष,नक्सलियों के हाथों मारे गए लोगों के परिजन शामिल है।इसके अलावा जिनकी सुरक्षा कम की गई है, उसमें अधिकतर जेड व वाई प्लस वाले हैं।पूर्व सीएम भूपेश बघेल,सांसद महेश कश्यप जैसे लोगों की सुरक्षा व्यवस्था यथावत है।
कुछ नेेताओं की सुरक्षा कम की गई है तो इसका मतलब यह नहीं है कि नेताओं को सुरक्षा के लिए भविष्य में कुछ नहीं किया जाएगा जैसे पहले कोई सुरक्षा जरूरी बताता था तो उसे जिस तरह स्थानीय स्तर पर सुरक्षा दी जाती थी,अब भी वैसी सुरक्षा पर मांगने पर दी जाएगी।नक्सलवाद के रहते बस्तर के तो तमाम नेताओं की जान की सुरक्षा को खतरा था,इसलिए बस्तर के नेताओं की सुरक्षा की ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया भी गया था,नेताओं की सुरक्षा के कारण बहुत से नेताओं की जान बची है,यह सरकार की जिम्मेदारी थी और उसने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह बखूबी किया है।पक्ष विपक्ष में भेद न कर जिनकी सुरक्षा जरूरी थी,सबको जरूरत के मुताबिक सुरक्षा दी गई।अब नेताओं को खुद ही सुरक्षा व्यवस्था के घेरे से बाहर आना चाहिए और होने वाले करोड़ो खर्च को बचाने का काम करना चाहिए।
माना जाता है कि नेताओं को जब आदत हो जाती सुरक्षा व्यवस्था मे रहने की उनको सुरक्षा की जरूरत न रहने पर भी अपने दबदबे के लिए सुरक्षा व्यवस्था जरूरी लगती है। दो दशक से यहां के नेताओं को सुरक्षा की आदत लगी हुई है, वह इसे अपनी इच्छा से तो कम करने से रहे,यह बात सरकार भी जानती है,इसलिए वह सुरक्षा व्यवस्था धीरे धीरे कम कर रही है।नेताओं का पद बड़ा हो न हो उसकी सुरक्षा मे ज्यादा आदमी होते हैं तो उसको लगता है कि मैं बड़ा आदमी हूं। इसलिए बीच में नेताओ ने जरूरत हो न हो सुरक्षा के लिए ज्यादा लोगों की जरूरत बताई है ताकि उनका रुतबा बढ़े और उनको खास समझा जाए।अब आम लोगों के बीच बड़े नेताओं को किसी तरह की सुरक्षा की जरूरत नहीं है तो उनको खुद ही सुरक्षा के घेरे से बाहर आकर उदाहरण पेश करना चाहिए दूसरे नेताओं के लिए।
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