दिखना चाहिए कानून सबके लिए बराबर है

Posted On:- 2026-10-27




सुनील दास


कहा तो जाता है कि कानून सबके लिए बराबर होता है,कानून की नजर में गरीब व अमीर सब समान हैं।कानून से बड़ा कोई नहीं होता है,कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं,उससे कोई बच नहीं सकता।किसी ने अपराध किया है तो उसे सजा जरूर मिलनी चाहिए।कहने सुनने में तो यह अच्छा लगता है,लेकिन कई बार ऐसे उदाहरण आते हैं कि लोगों को लगता है कि कानून उसी के लिए हैं जिसके पास पैसा है, जिसके पास पैसा है वह मनचाहा न्याय प्राप्त कर सकता है और गरीब लोगों न्याय को तरसते रह जाते हैं।ऐसे समय मे जब एक उदाहरण से यह दिखाई देता है कि कानून अमीर व गरीब सबके लिए बराबर है,जज और आम लोगों के लिए समान है तो लोगों को बहुत अच्छा लगता है।उम्मीद बंधती है कि अभी न्याय के क्षेत्र में ऐसे जज हैं जो मानते हैं कि कानून सबके लिए बराबर है और वह ऐसा फैसला करके दिखाते भी हैं कि हम कहते नहीं है,करके दिखाते भी है। जब न्याय होते हुए दिखता है तो लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था के प्रति कमजोर हो रहा विश्वास मजबूत होता है।
केरल के चेरानल्लूर में एडिशनल डिस्ट्रिक जज और मर्सिडीज के मालिक पिता पर केरल हाईकोर्ट ने केस दर्ज करने अनुमति दी है।जज के १७ साल के बेटे कार चलाते हुए रविवार की सुबह चेरानल्लूर में ५५ साल के फल विक्रेता को टक्कर मार दी.इससे फल विक्रेता जयबालकृष्णन की मौत हो गई।जैसा कि आम तौर पर होता है कि किसी बड़े आदमी का मामला होता है तो पुलिस मामले को निपटाने का प्रयास करती है।पुलिस जज के बेटे का मामला होने के कारण लापरवाही से मौत का मामला दर्ज किया और जज के बेटे को थाने से जमानत दे दी।परिवार व स्थानीय लोगों ने इस बात का विरोध किया तो मामले में गैरइरादतन हत्या की धारा जोड़ी गई जज के बेेटे को दोबारा हिरासत में लेकर जुवनाईल जस्टिस बोर्ड में पेश किया गया। बोर्ड ने उसे फिर जमानत दे दी। परिवार ने इसका विरोध किया और थाने के सामने धरना दिया।यह मुद्दा सोमवार को केरल विधानसभा में उठा।गृहमंत्री रमेश चेन्निथला ने माना कि इस मामले में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई ठीक नहीं थी।बाद में केरल हाईकोर्ट ने जज पिता के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति दी यानी यह माना गया कि बेटे ने गलती तो की है साथ ही पिता ने भी गलती की है अपने नाबालिग बेटे को कार चलाने की छूट देकर।जबकि जज होने के कारण पिता को मालूम है कि नाबालिग को कार चलाने देना गलत है।वह किसी जान ले सकता है या उसकी भी जान जा सकती है।
जज पिता न एक तो अपने बेटे को कार चलाने की अनुमति दी। बेटे ने लापरवाही से कार चलाते हुए एक परिवार के कमाऊ सदस्य की जान ले ली। जज पिता का मानना चाहिए कि उनके बेटे ने गलती है और इसके लिए उनको माफी मांगनी चाहिए तो उल्टा वह परिवार को डराने लगे। जिस पिता की मौत हो गई है उस बेटी का बयान है कि जज ने उससे कहा कि मुझे कानून मत सिखाओ। हादसे के बाद जज का व्यवहार बेहद खराब था।जज गलती करने के बाद भी अपने बेटे को बचाने का प्रयास कर रहे थे।पुलिस भी उनके जज होने के कारण कार्रवाई करने से डर रही थी।पुलिस व जज के व्यवहार एक बेटी को यही एहसास हुआ कि किसी के पास पैसा है या कोई ऊंचे पद पर बैठा है तो कानून उसके साथ है और आम आदमी के लिए कानून अलग है।मामला विधानसभा में नहीं उठा होता तो यह मामला भी जज का बेटा होने के कारण निपटा दिया गया होता। मामला विधानसभा में उठने के बाद गृहमंत्री को भी मानना पड़ा कि पुलिस ने शुरू में जो कुछ किया ठीक नहीं किया। इसके बाद जाकर पुलिस ने केरल हाईकोर्ट से जज के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति मांगी और केरल हाई कोर्ट ने अनुमति दी।
केरल हाई कोर्ट ने जज पिता पर के खिलाफ केस दर्ज करने की अऩुमति देकर अच्छा किया है। इससे ऐसा लगता तो है तो अदालतें और कुछ जज कानून की नजर में सबको समान मानते हैं।वह जज के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति देते हैं तो दिखता है कि कानून सबके लिए समान है। इस मामले में कानून सबके लिए समान है सच में तब माना जाएगा जब जज पिता और उसके नाबालिग बेेटे को उनके किए गए अपराध के लिए सजा भी मिले।जज पिता ने एक बार अपने बेटे को बचाने का प्रयास किया है तो आगे भी वह ऐसा कर सकते हैं।कानून के मुताबिक तो ऐसे मामले में पिता और बेटे पर अलग अलग कार्रवाई होती है।अभी बोर्ड तय करेगा कि नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदना चलेगा या नहीं।नाबालिग होने के कारण उसे जेल नहीं भेजा जा सकता,लेेकिन अधिकतम किसी सुधारगृह भेजा जा सकता है,२५वर्ष तक उसका ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनेगा।नाबालिग यदि माता पिता की अनुमति से वाहन चला रहा था तो उन्हें तीन साल की सजा हो सकती है।२५ हजार तक जुर्माना हो सकता है।वाहन का रजिस्ट्रेशन एक साल के लिए रद्द हो सकता है।
घर के नाबालिगों को बाइक व कार चलाने की अनुमति माता पिता को नहीं देनी चाहिए।यह उनकी जिम्मेदारी है,वह यह कहकर नहीं बच सकते कि उनके अऩुमति के बिना बच्चे बाइक या कार चलाते है।यातायात पुलिस भी स्कूल खुलने से लेकर साल भर बच्चों को स्कूल जाकर व माता पिता को कई तरह के कार्यक्रम चलाकर जागरूक करती है कि यह ठीक नहीं है इससे नुकसान होना तय है या तो आपका बच्चा घायल होगा मारा जाएगा या दूसरे का घायल करेगा या मारेगा।इसके बाद भी नाबालिग सड़क पर बाइक चलाते दिख जाते हैं तो इसके लिए माता पिता ही दोषी हैं। उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज होना काफी नहीं है, उनको सजा भी होनी चाहिए ताकि उनको और उनके बच्चों को ऐसा लगे तो उन्होंने गलत किया है और उनके बच्चों ने गलत किया है।



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