देश में लोकतंत्र है, देश में संविधान है, देश संविधान से चलता है। देश में कानून का राज है तो कोई भी नेता कितने भी बड़े परिवार का क्यों न हो, उसके घर से कितने ही लोग मंत्री,प्रधानमंत्री बन गए हो,उसे कानून के राज का मानना पड़ेगा, कानून के राज में कानून के राज को बनाए रखने के लिए जो भी प्रक्रिया तय की है, जिस प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है,उसे प्रक्रिया का पालन करना होगा।कोई भी प्रक्रिया बनाई ही इसलिए जाती है कि अव्यवस्था पैदा न हो, अराजकता पैदा न हो। बड़े बड़े पद पर बैठे लोगों से मिलने की एक प्रक्रिया है देश में,किसी को भी बड़े पद पर बैठे लोगों से मिलना है तो उसे प्रक्रिया का पालन करना होगा।गुरुवार को कांग्रेस सहित विपक्ष के नेताओं ने देश की राष्ट्रपति से मिलने के लिए समय मांगा है।
यह तय प्रक्रिया है, राष्ट्रपति से मिलना है तो पहले बताना पड़ता है कि किसी मामले में मिलना चाहते हैं,कांग्रेस ने पहला अनुराेध पत्र दो अक्टूबर को भेजा,इस पर राष्ट्रपति भवन से पांच अक्टूबर को नाम मांगा गया कि मिलने कितने लोग आएँगे, कांग्रेस की तरफ से पांच अक्टूबर को नाम दिए गए और बताया गया कि 7,8,9 अक्टूबर को मिलने का समय मांगा। अब जब राष्ट्रपति भवन से बुलाया जाएगा तब जाकर कांग्रेस व विपक्ष के नेता राष्ट्रपति से मिल सकते हैं।एसआईआर के मुद्दे पर उनसे जो मांग करनी है, कर सकते हैं।कांग्रेस के राहुल गांधी हो, प्रियंका गांधी हो या कांग्रेस अध्यक्ष खरगे हों या विपक्ष के और कोई भी नेता हों उनको राष्ट्रपति अपनी सुविधा से मिलने का समय दे सकती हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि वह आज मिलना चाहता है तो राष्ट्रपति को आज ही मिलना होगा।
जैसे राष्ट्रपति का अपना प्रोटोकाल होता है, इसी तरह संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का भी अपना प्रोटोकाल होता है।उनसे भी मिलने के लिए एक प्रक्रिया है और मिलने के लिए उस प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है, चाहे राहुल गांधी या प्रियंका गांधी हो, वह कहीं बैठकर यह कहें कि सीईसी ज्ञानेश कुमार से वह मिलना चाहते हैं, बात करना चाहते हैं या 3 सौ सांसद मिलना,बात करना चाहते हैं तो वह उनसे मिलने आ जाएंगे या मिलने के लिए बुला लेंगे।संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति का समय बहुत कीमती होता है, उसके रोज का तय शेड्युल होता है, आज किससे मिलना है, आज क्या काम करना है,वह शेडयुल के हिसाब से काम करते हैं, मिलते हैं।कोई मार्च निकालकर उनसे मिलना चाहता है तो उनसे मिलने की यह प्रक्रिया गलत है, इस तरह सीईसी ज्ञानेश कुमार से कोई नहीं मिल सकता।यही वजह है कि राहुल गांधी आकाशवाणी में धरना देकर भी नहीं ज्ञानेश कुमार से नहीं मिल सके, ज्ञानेश कुमार ने उनको मिलने के लिए बुलाया नहीं।
देश में हर काम के लिए एक प्रक्रिया है, प्रक्रिया इसलिए हैं कि लोकतंत्र में जो अधिकार वह बना रहे और आम लोगों को किसी भी तरह के आयोजन पर किसी तरह की परेशानी न हो। इसलिए किसी दल को किसी दल के नेता को मार्च करना हो,जंतर मंतर पर धऱना देना हो या राजघाट पर जाकर धरना देना हो तो उसके लिए तय प्रक्रिया के तहत अनुमति लेनी पड़ती है, यदि कोई बिना अनुमति के मार्च निकालना चाहता है,धरना देना चाहता है तो उसे वैसा नहीं करने दिया जाता है क्योंकि ऐसा करने पर यातायात प्रभावित होता है, लोगों को काम प्रभावित होता है,उपद्रव हो सकता है,हिंसा हो सकती है, कानून व्यवस्था बिगड़ सकता है। कुछ दिन पहले अनुमति मांगने पर पुलिस को उस दिन व्यवस्था बनाने के लिए तैयारी करनी पड़ती है। इंडिया गठबंधन ने बिना अनुमति के मार्च निकाला तो उस दिन हजारों लोगों को परेशानी हुई, दूसरे दिन बिना अनुमति के जंतर मंतर पर धरना देने का प्रयास किया गया तो दूसरे दिन भी सड़कों पर भीड़ के कारण लोगों को परेशानी हुई।कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दोनों दिन पुलिस को बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों के लोगों का गिरफ्तार करना पड़ा।
तीसरे दिन यानी गुरुवार 8 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 8 अक्टूबर को घोषणा की कि INDIA गठबंधन के सांसद, वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन) में कथित गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली में गांधी स्मारक पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करेंगे अगर कांग्रेस इसके लिए भी अनुमति नहीं लेती है तो पुलिस यहां भी इनको धरना देने के पहले हिरासत में ले सकती है।कोई भी जब बड़े व जिम्मेदारी के पद पर होता है, उसे अपने पद की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए और दूसकों के संवैधानिक पद की गरिमा का भी ख्याल रखना चाहिए। ऐसा न करने पर व्यक्ति के साथ साथ पद की फजीहत भी होती है।लोग कहते हैं कि यह अपने और दूसरे के पद की गरिमा का ख्याल नहीं रखता है तो यह इस पद के लायक नहीं है। राहुल गांधी संसद में नेता प्रतिपक्ष हैं, गांधी परिवार से हैं,उनके पद की अपनी गरिमा है,उनके परिवार की अपनी गरिमा है, कुछ भी कहते वक्त,करते वक्त उनको अपने पद व परिवार की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए।राहुल गांधी व अभिजीत दीपके व नेहा बोरा से बहुत बड़े नेता हैं, वह जैसा कहते हैं और करते हैं, वैसा उनको नहीं करना चाहिए।वह बैरीकेड पर चढ़ते हैं तो कोई कुछ नही कहता है लेकिन राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ते हैं तो यह बहुत सारे लोगों को अच्छा नहीं लगता है क्योंकि इससे उनके पद और परिवार की गरिमा को ठेस लगती है।
सीजेपी के नेता अराजकता फैलाने को ही आंदोलन मानते हैं,यह आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाना चाहते है,इसलिए उनके खिलाफ पुलिस कानून के अनुरूप कार्रवाई करती है।राहुल गांधी के नाम में गांधी है तो उनको ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए जिससे गांधी नाम बदनाम हो।देश में बड़े नेताओं ने शांतिपूर्ण आंदोलन किए हैं,उनके आंदोलन के कारण आज भी उनको याद किया जाता है।आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाई जाती है तो ऐसे लोगों को इतिहास में कोई याद नहीं करता है। अराजकता फैलाने पर देश के हजारों लोगों को परेशानी होती है, इसलिए आम लोग भी ऐसे आंदोलन का समर्थन नहीं करते हैं जिससे उऩको रोज परेशानी होती है।लोकतंत्र में राहुल गांधी को आंदोलन करने का अधिकार है तो उनको ऐसा आंदोलन करना चाहिए कि लोगों को लगे कि यह ठीक है,इसकी सराहना की जा सकती है, कांग्रेस और राहुल गांधी आंदोलन के नाम पर सीजेपी की तरह अराजकता फैलाएंगे तो भाजपा को कहने का मौका मिलेगा कि राहुल गांधी व कांग्रेस भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसी अराजकता फैलाना चाहते हैं।‘‘भारत का लोकतंत्र जीवंत, मजबूत और सुरक्षित है तथा देश में शांति है। क्या कुछ अंतरराष्ट्रीय ताकतें सत्ता में आने के लिए बेताब राहुल गांधी के साथ मिलकर देश में आग लगाकर और अराजकता फैलाकर उनके परिवार को फिर से सत्ता में लाने की कोशिश कर रही हैं?
लोकतंत्र में सबको अधिकार मिले हुए हैं,राजनीति करने वालों को मार्च करने,रैली निकालने,धरना देने,प्रदर्शन करने और आंदोलन करने का अधिकार है तो पुलिस क...
देश में लोकतंत्र हैं,लोकतंत्र में बहुत सारे राजनीतिक दल होते हैं, जो चुनाव लड़ते हैं और चुनाव एक दल जीतता है और वही सरकार बनाता है। चुनाव के लिए हम...
देश में लोकतंत्र है,लोकतंत्र में सबको अपनी बात,अपनी राय रखने का अधिकार होता है,सब हर मामले पर अपनी अपनी राय रखते हैं और इससे तो यह पता चलता है कि ...
जिंदगी के सफर में बहुत सारे लोगों की जिंदगी मे एक न एक बार ऐसा मौका जरूर आता है कि उनको कुछ सेकंड में ही यह फैसला करना होता है कि मैं अपनी जान बचाऊ...
..लोकतंत्र में राजनीतिक व गैरराजनीतिक संगठनों को शांति से विरोध करने करने, मांग करने का अधिकार है।यह अधिकार तब दिया जाता है जब राजनीतिक व गैरराजनीत...