शांतिपूर्ण आंदोलन करने का एक बार मौका देखकर देख लिया.

Posted On:- 2026-10-02




सुनील दास

..लोकतंत्र में राजनीतिक व गैरराजनीतिक संगठनों को शांति से विरोध करने करने, मांग करने का अधिकार है।यह अधिकार तब दिया जाता है जब राजनीतिक व गैरराजनीतिक संगठन शांति से विरोध करने की अनुमति लेकर शांति से, शालीनता से विरोध प्रदर्शन करके दिखाएं। अक्सर राजनीतिक व गैरराजनीतिक संगठन शांति से विरोध करने की अनुमति लेकर अपने प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बनाए  नहीं रख पाते है।भीड इकट्ठा करते है और भीड़ को संभाल नहीं पाते हैं और दो टूक कह देते हैं कि हंगामा व उपद्रव करने वाले हमारे लोग नहीं थे। हंगामा व उपद्रव करने वालों को रोकना व पकडऩा तो पुलिस का काम है।हंगामा हुआ है,उपद्रव हुआ है तो यह पुलिस की गलती से हुआ है।जंतर मंतर पर पिछली बार पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति दी तो क्या हुआ,दिल्ली में भीड़ एकत्र कर खूब अराजकता फैलाई गई।
इसलिए इस बार जंतर मंतर पर सीईसी के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति मांगने पर भी नहीं दी गई क्योंकि जंतर मंतर एक बार अराजकता फैलने के बाद यदि फिर से दिल्ली भीड़ अराजकता फैलाती है तो इससे पुलिस प्रशासन की छबि ही खराब होती है। इसलिए दिल्ली पुलिस ने किसी तो जंतर मंतर में सीईसी के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी।इस बार दिल्ली में सीईसी के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन सीजेपी की जगह आम आदमी पार्टी,आइसा,एऩएसयूआई ने की थी।इस बार पुलिस ने कोई अऩुमति नहीं दी और नई दिल्ली और आसपास निषेधाज्ञा लागू कर दी साथ ही और जो कुछ किया जा सकता वह सब किया और जिन लोगों ने प्रदर्शन करने का प्रयास किया उन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।कुल मिलाकर ७०० लोगों को गिरफ्तार किया गया है और किसी को जंतर मंतर में प्रदर्शन नहीं करने दिया गया।
शांति व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का काम है, जंतर मंतर में एक के मामले में वह भले ही शांति व्यवस्था बनाने के मामले में पुलिस चूक गई हो लेकिन पिछली गलती से उसने सबक लिया और किसी राजनीतिक या गैरराजनीतिक संगठन को दिल्ली में अराजकता नहीं फैलाने दी।राजनीतिक व गैरराजनीतिक संगठन को पुलिस कभी कभी आंदोलन व प्रदर्शन की अनुमति देती है तो वह समझते हैं कि उनको प्रदर्शनस्थल पर कुछ भी करने की छूट मिल गई है,किसी को भी गाली देने की छूट मिल गई है और वह बहुत कुछ ऐसा करते हैं जो देश के लोगों को बुरा लगता है और लोग ऐसे आंदोलन को पसंद नहीं करते हैं और लोग भी चाहते हैं कि पुलिस को ऐसे संगठनों को प्रदर्शन करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
जहां तक सीईसी का इस्तीफा मांगने वाले दलों व संगठनों का सवाल है तो मालूम तो उन्हें भी है कि उनके इस्तीफा मांगने से तो सीईसी इस्तीफा देने वाले नहीं है। देश के शिक्षा मंत्री प्रधान का इस्तीफा हो जाने के बाद कुछ लोगों को लगता होगा कि वह इस्तीफा मांगेगे और सीईसी ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें देंगे तो यह उनकी वहम है क्योंकि ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा तो सरकार भी नहीं ले सकती,इसलिए सरकार इस मामले मे जरा भी चिंतित नही है कि ज्ञानेेश कुमार से कुछ लोग इस्तीफा मांग रहे हैं।सरकार के हिसाब से तो इस मामले में उसका कोई संबंध नहीं है, वह कुछ नहीं कर सकती।यह तो विपक्ष व ज्ञानेश कुमार के बीच का मामला है।विपक्ष को भी मालूम है कि ज्ञानेश कुमार को आंदोलन करके,इस्तीफा मांगकर नहीं हटाया जा सकता। फिर भी विपक्ष के कुछ दलों द्वारा ऐसा किया जा रहा है तो यह इसलिए कि यही आसान है उसके लिए।संसद में विपक्ष के पास बहुमत नहीं है और संसद में सीईसी के खिलाफ महाभियोग लाने का मतलब बेकार की कवायद है।यानी  कुल मिलाकर विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बोल कुछ भी ले लेकिन कर कुछ नहीं सकता।
जंतर मंतर वन के वक्त तो पुलिस प्रशासन ने अनुमति देकर देख लिया कि एक बार मंडप लग गया तो उसे हटाना कितना मुश्किल होता है,सरकार ने संवाद करके देख लिया लेकिन संवाद से कुछ नहीं हुआ, शिक्षामंत्री का इस्तीफा लेना ही पड़ा।इस बार सीजेपी को मालूम था कि उसे जंतर मंतर पर तो अनुमति मिलेगी नही,इसलिए उसने इस बार मुंबई शिवाजी  पार्क में आंदोलन करने का फैसला किया लेकिन उनकी ख्याति दिल्ली से यहां पहुंच जाने के कारण उनको मुबंई के शिवाजी पार्क मेें आंदोलन की अनुमति नहीं दी गई है।किसी एक संगठन का कोई आंदोलन सफल हो जाता है तो सभी राजनीतिक व गैरराजनीतिक दलों को लगता है कि एक संगठन सरकार को छोटे मामले मे झुका सकता है तो हमारा मुद्दा तो बडा़ है हम भी सरकार को झुका सकते हैं उसको फिर एक बार झुकने को मजबूर कर सकते हैं लेकिन इस बार मामला सरकार का है ही नहीं। क्योंकि सीईसी को शिक्षामंत्री जैसा पद तो है नहीं कि उनसे सरकार इस्तीफा ले ले। मामला सरकार का नहीं है इसलिए सरकार को कुछ करने की जरूरत नहीं है,कानून व्यवस्था का मामला है तो राज्य सरकार का काम है राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखना।चाहे दिल्ली हो या मुंबई वहां की राज्य सरकारों ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो कुछ  करना उनके बस में था सब किया है। अच्छी बात यह है कि चाहे दिल्ली हो मुंबई हो अराजकता फैलाने वालों को अराजकता नहीं फैलाने दिया।



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