दूसरों को बचाने का फैसला करना बहुत मुश्किल होता है

Posted On:- 2026-10-04




सुनील दास

जिंदगी के सफर में बहुत सारे लोगों की जिंदगी मे एक न एक बार ऐसा मौका जरूर आता है कि उनको कुछ सेकंड में ही यह फैसला करना होता है कि मैं अपनी जान बचाऊं या दूसरे की जान बचाऊं।सड़क पर किसी को हादसे से बचाने का अवसर हो तो ज्यादातर लोग अपनी जान खतरे में डालने बच जाते हैं,वह सोचते हैं कि मैं क्योंं अपनी जान खतरे में डालूं,कोई आदमी किसी महिला या कमजोर को पीट रहा है तो लोग कमजोर को मारने का तमाशा देखते हैं,उसे बचाने सामने नही आते हैं कि वह बचाने जाएंगे तो उनकी पिटाई हो जाएगी।कहीं आग लग जाए तो लोग सबसे पहले अपनी जान बचाने की सोचते हैं,कहीं कोई डूब रहा होता है तो लोग उसे डूबते देखते रहते हैं कि यह सोचकर कि उसे बचाने जाएंगे तो हम भी डूब जाएंगे।कई बार ऐसा होता है कि कोई गहरे गड्ढे में गिर जाए तो लोग उसे बचाने गड्ढे में उतरते नहीं है। दूसरे की जान बचाने में ज्यादातर लोग यह देखते हैं कि दूसरे की जान बचाने में कहीं मैं तो मारा नहीं जाऊंगा और अपनी जान जाने के डर से वह किसी बचाने की जगह खुद को बचा लेते हैं हीरो बनने का,सुपर हीरो बनने का मौका खो देते हैं।
भारतीय पायलेट कैप्टन स्मित मछार के सामने भी वैसी ही स्थिति वक्त आई जब को पायलट ने दुबई से तेल अवीव जा रहे यात्री विमान को क्रैश करने का प्रयास किया।उसने भारतीय पायलट पर कुल्हाड़ी से हमला किया और विमान को क्रैश करने के लिए नीचे गिरने दिया। ऐसे कठिन वक्त में जब भारतीय पायलट घायल हो चुका था,उसे फैसला करना था कि मेरी जान बचाऊं या विमान में सवार यात्रियों की जान बचाऊं,उसने अपनी जान की परवाह नहीं कि और सोचा कि मैं यात्रियों की जान कैसे बचा सकता हूं,उसने यात्रियों की जान बचाने का फैसला किया। यात्रियों की जान काकपिट खोलने से बच ही सकती थी इसलिए उसने अपनी जान की परवाह नहीं की और काकपिट का दरवाजा खोला और उसके इस प्रयास से यात्रियों ने आकर विमान को क्रैश करने पर उतारू को पायलट को पकड़ा और वह विमान जो नीचे गिरकर कुछ सेकंड में क्रैश होने वाला था उसे स्मित मछआऱ ने दूसरे पायलटों की मदद से सुरक्षित सऊदी अरब में उतारने में सफल रहे।
विमान में १७४ यात्री थे,उनमें ज्यादातर इजराइली थे।बुरी तरह घायल स्मित मछार को कुछ सेकंड में फैसला करना था कि मैं अपनी जान बचाऊं या १७४ यात्रियों की जान बचाऊं, उसने १७४ यात्रियों की जान बचाने का फैसला किया।जो मरने का खतरा उठाकर दूसरो को बचाना है वही हीरो होता है, वही सुपर हीरो होता है। स्मित मछार ने आज इस कथन को भी सच साबित कर दिया कि भारतीय जान लेने वाला नहीं बचाने वाला होता है।बचाने वाले की पूरी दुनिया तारीफ करती है,यही वजह है कि आज स्मित पूरी दुनिया के हीरों हैं। हर कोई उनकी तारीफ कर रहा है,पीएम मोदी ने वीडियो काल कर उनका हाल पूछा तो स्मित ने जो कहा वह तारीफ करने योग्य हैं कि मैं यात्रियों को मरने नहीं दे सकता था।इस एक वाक्य से पता चलता है कि कोई भारतीय संकट के समय कितने साहस का परिचय दे सकता है। इससे यह भी पता चलता है कि एक आस्थावान भारतीय की आस्था संकट के समय उसके लिए कितना बड़ा सहारा होती है।स्मित घायल थे हनुमान चालीसा का पाठ करते रहे इससे उनको वह करने की ताकत मिली जो वह जो करना चाहते यानी यात्रियों को बचाने की ताकत और वह बचाने में सफल रहे।
हकीकत यह है कि जाहिर तौर पर तो स्मित ने अपने विमान के यात्रियों को हो बचाया है लेकिन साथ ही भारतीय पायलटों पर जो कलंक लगता भारतीय पायलटों पर कोई कलंक नहीं दिया कि भारतीय पायलट अपने विमान के यात्रियों को बचा नहीं सका।स्मित मछार के यात्रियों को महासंकट के समय बचा लेने से अब पूरी दुनियां के लोग भारतीय पायलटों पर भरोसा करेंगे कि विमान का पायलट यदि भारतीय है तो वह उनको हर संकट से बचा सकता है।यही नहीं अगर दुर्घटना हो जाती तो यह अमेरिका के ट्विन टावरों पर हुए आतंकी घटना का ही दूसरा रूप होती, संभव है इसके बाद इस्राईल की भी सैनिक प्रक्रिया होती और दुनिया में शांति व्यवस्था को नया खतरा पैदा हो जाता, जो पहले ही इरान-अमेरिका और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते संकट में चली आ रही है। स्मित मच्छार की बहादुरी ने न केवल पौने दो सौ लोगों का जीवन बचाया बल्कि दुनिया को भी एक बड़े संकट से बचा लिया।
यही वजह है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कैप्टन स्मित मच्छार के साहस को ‘अविश्वसनीय’ बताया। पीएम मोदी ने उन्हें ‘हीरो’ बताते हुए कहा कि उनके साहस ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने और एक बड़ी त्रासदी को टालने में मदद की। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पायलट ने दरवाजा खोलकर अहम भूमिका निभाई। इस घटना के बाद  एक और भारतीय वीरांगना नीरजा भनोट को भी याद किया जा रहा  है जो इसी तरह की घटना में शहीद हुई थीं परंतु जीवन के अंतिम क्षण तक अपहृत जहाज के यात्रियों की सुरक्षा के लिए आतंकियों से लड़ती रहीं। उनकी बहादुरी को देख कर पाकिस्तान ने भी उन्हें तमगा-ए-इंसानियत पुरस्कार से सम्मानित किया। 
5 सितंबर 1986 की सुबह कराची का जिन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पैन अमेरिकन वल्र्ड की फ्लाइट 73 मुंबई से न्यूयॉर्क के सफर पर थी और कराची उसका एक पड़ाव था। विमान में करीब 360 यात्री और 19 क्रू सदस्य मौजूद थे। लेकिन अचानक विमान में चार हथियारबंद आतंकी घुस आए और उन्होंने फ्लाइट को हाईजैक कर लिया। उस समय विमान की सीनियर फ्लाइट पर्सर थीं 22 साल की नीरजा भनोट। हालात बेहद खतरनाक थे, लेकिन नीरजा ने घबराने के बजाय यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकलने में मदद की। इसी दौरान वह आतंकवादियों की गोली का निशाना बन गईं। इस घटना में 20 लोगों की मौत हुई. हालांकि, नीरजा की सूझबूझ और साहस के कारण सैकड़ों यात्री सुरक्षित बच पाए थे।नीरजा भनोट की बहादुरी को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में सम्मान मिला. भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। वही काम आज बरसों बाद फिर एक भारतीय ने किया है और उसे भई दुनियां के तमाम देशों से वही सम्मान मिल रहा है।स्मित मछार जैसे सुपर हीरो को जो सम्मान मिल रहा है उसे हर भारतीय आज खुद को गौरवशाली महसूस कर रहा है।



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