विशेष लेख : पोषण पुनर्वास केंद्र और बदलती जिंदगीः कुपोषण की पीड़ा से स्वस्थ और खुशहाल बचपन की ओर लौटते बच्चे

Posted On:- 2026-09-25




बच्चे का बढ़ता वजन सिर्फ तराजू पर बढ़ती संख्या नहीं, बल्कि लौटती ताकत, मुस्कान और बचपन की कहानी है।

(विशाल कुमार जायसवाल

सहायक सूचना अधिकारी अम्बिकापुर)

अम्बिकापुर (वीएनएस)। सरगुजा जिले के शासकीय रघुनाथ जिला चिकित्सालय, अंबिकापुर में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र ( NRC) की कहानी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उन बच्चों की कहानी है, जिनका बचपन कुपोषण के कारण कमजोर पड़ रहा था, लेकिन समय पर उपचार, पोषण, देखभाल और माता-पिता के मार्गदर्शन से वे फिर स्वस्थ जीवन की ओर लौट रहे हैं।

बचपन जीवन का वह दौर है जिसमें बच्चे को बीमारी और कमजोरी के बजाय खेलना, दौड़ना, हंसना, सीखना और सपने देखना चाहिए। लेकिन जब यही बचपन कुपोषण की गिरफ्त में आ जाता है तो बच्चे का शरीर ही नहीं, उसकी सक्रियता, सीखने की क्षमता, सामाजिक सहभागिता और पूरे परिवार की दिनचर्या प्रभावित होने लगती है। इसलिए पोषण पुनर्वास केंद्र केवल एक स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि बच्चे के खोते हुए बचपन को वापस लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

कुपोषण सिर्फ कम वजन का नाम नहीं

कुपोषण को केवल इस रूप में देखना कि बच्चा दुबला या कमजोर दिखाई दे रहा है, समस्या को बहुत छोटा करके देखना होगा। गंभीर कुपोषण में बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है और सामान्य संक्रमण भी उसके लिए अधिक गंभीर हो सकते हैं।

UNICEFके अनुसार  लंबाई/कद के अनुपात में बहुत कम वजन वाली स्थिति बच्चों में कमजोर प्रतिरक्षा, विकास में देरी तथा गंभीर मामलों में मृत्यु के जोखिम से जुड़ी है।

WHO के अनुसार दीर्घकालीन पोषण की कमी से stunting जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसका संबंध शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास, सीखने और विद्यालयी प्रदर्शन पर पड़ने वाले प्रभावों से भी है।

कुपोषण बच्चे के शरीर तक सीमित समस्या नहीं है। इसका प्रभाव उसके स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास, भविष्य की उत्पादकता और परिवार की आर्थिक स्थिति तक पहुंच सकता है।

जब दूसरे बच्चे खेलते हैं, तब कुपोषित बच्चा क्या महसूस करता होगा?

एक स्वस्थ बच्चा मैदान में दौड़ता है। वह अपने दोस्तों के साथ खेलता है, गिरता है, उठता है, फिर दौड़ता है। उसे हर छोटी गतिविधि के लिए अपने शरीर से संघर्ष नहीं करना पड़ता।

इसके विपरीत, गंभीर रूप से कुपोषित बच्चा कई बार सामान्य गतिविधियों में भी जल्दी थक सकता है। दूसरे बच्चों को खेलते-कूदते देखकर उसके मन में भी उनके साथ शामिल होने की इच्छा पैदा होती होगी, लेकिन कमजोर शरीर उसका साथ नहीं देता।

यहीं कुपोषण का एक ऐसा पक्ष सामने आता है जिसे केवल वजन मशीन या मेडिकल रिपोर्ट से नहीं समझा जा सकता।

”कुपोषण बच्चे के शरीर को ही नहीं, उसके बचपन के अनुभवों को भी सीमित कर सकता है।“

बीमारी के कारण वह बार-बार घर में रह सकता है। दूसरे बच्चों की तरह खेल और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी कम हो सकती है। परिवार के लोग भी उसकी कमजोरी को लेकर लगातार चिंतित रहते हैं। कई बार समाज की दया भरी निगाह बच्चे के आत्मविश्वास को और प्रभावित कर सकती है।

इसलिए जरूरत केवल यह कहने की नहीं है कि “बच्चा कमजोर है”। जरूरी यह समझने की है कि हर कमजोर बच्चे के पीछे एक ऐसा बचपन हो सकता है, जिसे सामान्य जीवन का अवसर चाहिए।

पोषण पुनर्वास केंद्र जहां उपचार के साथ वापस मिलता है बचपन

पोषण पुनर्वास केंद्र यानी Nutrition Rehabilitation center गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के लिए उपचार और पोषण पुनर्वास की महत्वपूर्ण व्यवस्था है।

ऐसे केंद्रों में बच्चे की पोषण स्थिति की निगरानी, चिकित्सकीय देखभाल, पोषणयुक्त आहार तथा माता-पिता को बच्चे की देखभाल और पोषण संबंधी व्यवहार के बारे में प्रशिक्षण जैसे प्रयास किए जाते हैं। गंभीर कुपोषण के उपचार में जीवन के लिए जोखिम पैदा करने वाली जटिलताओं की पहचान और उपचार के बाद पोषण पुनर्वास के माध्यम से बच्चे की वृद्धि को सुधारना महत्वपूर्ण होता है।

NRC   ने लौटाई बच्चों के बचपन की मुस्कान

शासकीय रघुनाथ जिला चिकित्सालय, अंबिकापुर में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र ( NRC) कुपोषित बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है। 20 बिस्तरों वाले इस केंद्र में वर्ष 2021-22 में 189 बच्चों से शुरू हुई उपचार यात्रा में कर 73 प्रतिशत था, जो अप्रैल-सितंबर 2026 में 248 बच्चों के उपचार के साथ बढ़कर 88 प्रतिशत दर्ज हुआ है।

इस बदलाव की तस्वीर यहां उपचार लेने वाले शिवाशी, रश्मि, प्रतीक और युवराज जैसे बच्चों के रिकॉर्ड में भी दिखाई देती है। शिवाशी का वजन 7.6 से बढ़कर 8.840 किलोग्राम, रश्मि का 9.3 से 10.720 किलोग्राम, प्रतीक का 8.5 से 9.370 किलोग्राम और युवराज का 12 से बढ़कर 13.980 किलोग्राम दर्ज हुआ। ये केवल वजन के आंकड़े नहीं, बल्कि बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य की ओर बढ़ते कदम हैं।

कुपोषण बच्चे के शरीर को कमजोर करने के साथ उसके सामान्य बचपन को भी प्रभावित करता है। जब स्वस्थ बच्चे खेलते-कूदते हैं, तब कमजोर बच्चा कई बार उनके साथ शामिल नहीं हो पाता। ऐसे में छत्ब् उपचार, पोषण और माता-पिता के मार्गदर्शन के माध्यम से बच्चे को फिर से स्वस्थ जीवन और खुशहाल बचपन की ओर लौटने का अवसर देता है।

इस प्रकार NRC में ”एक बच्चे का बढ़ता वजन सिर्फ तराजू पर बढ़ती संख्या नहीं, बल्कि लौटती ताकत, मुस्कान और बचपन की कहानी है।“ यह संभवतः उस बच्चे के शरीर में वापस आती ऊर्जा, बेहतर पोषण और उपचार के प्रति प्रतिक्रिया का संकेत है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि बच्चा पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हो सके, बीमारी से लड़ने की क्षमता में सुधार की दिशा में बढ़ सके और सामान्य वृद्धि की ओर लौट सके।

हर बच्चे की चिकित्सा स्थिति अलग होती है, इसलिए केवल वजन बढ़ने से संपूर्ण स्वास्थ्य का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। फिर भी ऐसे रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि समय पर हस्तक्षेप और निरंतर पोषण देखभाल से सुधार संभव है।

अगर कुपोषण का इलाज न हो तो समस्या कितनी बड़ी हो सकती है?

गंभीर कुपोषण को केवल “कम वजन” मानकर छोड़ देना खतरनाक हो सकता है। इससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। कुपोषित बच्चे की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है। दस्त, श्वसन संक्रमण और अन्य सामान्य बीमारियां गंभीर रूप ले सकती हैं। कुपोषित बच्चे जीवन-घातक जटिलताओं के जोखिम में भी हो सकते हैं। लंबे समय तक पोषण की कमी बच्चे की लंबाई, वजन और समग्र शारीरिक विकास को प्रभावित कर सकती है।  मानसिक और संज्ञानात्मक विकास प्रभावित हो सकता है। जो बच्चा बार-बार बीमार पड़ता है, कमजोर रहता है या विकास में पीछे रह जाता है, उसके लिए नियमित रूप से पढ़ाई और विद्यालयी गतिविधियों में भाग लेना कठिन हो सकता है। यदि बच्चा बार-बार बीमार होता है तो माता-पिता को काम से छुट्टी लेनी पड़ सकती है। गरीब परिवारों में यह अतिरिक्त बोझ परिवार की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर सकता है। इस समस्या का पीढ़ियों तक जाने का जोखिम है।  कुपोषण का प्रभाव केवल वर्तमान बचपन तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव जीवनभर बने रह सकते हैं और अगली पीढ़ी को भी प्रभावित कर सकते हैं।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कुपोषित बच्चा निश्चित रूप से भविष्य में अपने बच्चों को भी कुपोषित करेगा। लेकिन मातृ कुपोषण, कम जन्म वजन, खराब शिशु आहार और गरीबी जैसे कारक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पोषण संबंधी जोखिम बढ़ा सकते हैं।

यही कारण है कि कुपोषण से लड़ाई को केवल वर्तमान बीमारी का उपचार नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी में निवेश भी माना जाना चाहिए।

NRC  में बच्चे का उपचार हो जाना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह यात्रा वहीं समाप्त नहीं होती। बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए परिवार को यह भी समझना जरूरी है कि बच्चे को उम्र के अनुसार पर्याप्त और विविध आहार कैसे देना है। बीमारी के दौरान भोजन और तरल पदार्थ की देखभाल कैसे करनी है। स्वच्छता और हाथ धोने का महत्व क्या है। संक्रमण से बच्चे को कैसे बचाना है।

स्तनपान और पूरक आहार का उचित महत्व क्या है।

बच्चे की वृद्धि और वजन की नियमित निगरानी क्यों जरूरी है। बच्चा दोबारा कुपोषण की स्थिति में न पहुंचे, इसके लिए किन संकेतों पर तुरंत स्वास्थ्य केंद्र जाना चाहिए।

इसके लिए जिला प्रशासन , स्वास्थ्य और महिला बाल विकास विभाग विभाग के समन्वय का महत्व बहुत बड़ा है।  NRC   में बच्चे का उपचार और पोषण पुनर्वास तथा समुदाय में आंगनबाड़ी एवं अन्य सेवाओं के माध्यम से परिवार को पोषण संबंधी व्यवहार की जानकारीकृये दोनों मिलकर एक मजबूत व्यवस्था बना सकते हैं।

सुपोषित बच्चा केवल स्वस्थ शरीर नहीं, स्वस्थ भविष्य है

जब कोई बच्चा स्वस्थ होता है तो वह केवल बीमारी से बचा हुआ बच्चा नहीं होता।

वह-दौड़, खेल सकता है। स्कूल जा सकता है।

सीख सकता है। दोस्त बना सकता है। सपने देख सकता है और उन सपनों को पूरा करने की क्षमता विकसित कर सकता है। यही स्वस्थ बचपन आगे चलकर स्वस्थ किशोरावस्था, बेहतर शिक्षा, बेहतर कार्यक्षमता और बेहतर सामाजिक जीवन की नींव बन सकता है।

इसके विपरीत, यदि जीवन के शुरुआती वर्षों में कुपोषण को नजरअंदाज किया जाए तो बच्चे के विकास की महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।  इसलिए किसी बच्चे को कुपोषण से बाहर निकालना केवल एक परिवार की समस्या हल करना नहीं है-यह मानव संसाधन और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को मजबूत करना है।

NRC  की सफलता का सबसे बड़ा अर्थ-बचपन की वापसी

अंबिकापुर के पोषण पुनर्वास केंद्र के आंकड़े एक ऐसी यात्रा की ओर संकेत करते हैं जिसमें कमजोर और कुपोषित बच्चों को उपचार और पोषण के माध्यम से सामान्य वृद्धि की दिशा में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है। 73 प्रतिशत बनतम तंजम से वर्तमान में दर्ज 88 प्रतिशत बनतम तंजम तक की यात्रा केवल प्रतिशतों की यात्रा नहीं है। इसके पीछे सैकड़ों परिवारों की चिंता, स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत, माताओं-पिताओं की भागीदारी और बच्चों की बेहतर होती सेहत की कहानियां छिपी हैं।

एक  NRC  की वास्तविक सफलता तब है जब वहां आने वाला बच्चा केवल वजन बढ़ाकर वापस न जाए, बल्कि उसके माता-पिता यह सीखकर जाएं कि आगे अपने बच्चे को फिर से कुपोषण की ओर नहीं जाने देना है।

क्योंकि कुपोषण से लड़ाई केवल अस्पताल के बिस्तर पर नहीं जीती जाती। यह लड़ाई घर की थाली, माता-पिता की समझ, आंगनबाड़ी की निगरानी, स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह और समाज की संवेदनशीलता से मिलकर जीती जाती है।

हर बच्चे को दया नहीं, अवसर चाहिए

कुपोषित बच्चे को देखकर हमें केवल दया नहीं आनी चाहिए। उसे स्वास्थ्य, पोषण, सम्मान और सामान्य बचपन का अधिकार मिलना चाहिए।

जिस बच्चे को कभी दूसरे बच्चों को खेलते देखकर अपने भीतर एक अधूरी इच्छा महसूस होती थी,  NRC   और सुपोषण की समन्वित व्यवस्था का लक्ष्य यही होना चाहिए कि वह बच्चा भी एक दिन मैदान में दौड़े-बिना किसी दया की नजर के, बिना कमजोरी की बाधा के और पूरे आत्मविश्वास के साथ।

कुपोषण बच्चे की पहचान नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसकी समय पर पहचान, उपचार और निरंतर देखभाल से बच्चे को स्वस्थ विकास की राह पर वापस लाने का प्रयास किया जा सकता है।

इस अर्थ में एक पोषण पुनर्वास केंद्र केवल 20 बिस्तरों की स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए बीमारी से बचपन, कमजोरी से ऊर्जा और चिंता से उम्मीद की ओर जाने वाला पुल है।

और जब किसी बच्चे का वजन बढ़ता है, उसकी आंखों में चमक लौटती है और वह फिर से खेलने के लिए उठ खड़ा होता है-तभी किसी NRC की सफलता का सबसे मानवीय अर्थ सामने आता है।

यही है-कुपोषण से सुपोषण की ओर, बीमारी से स्वास्थ्य की ओर और छिनते बचपन से खुशहाल बचपन की ओर लौटने की कहानी।



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