जीत का एहसास कराकर हराना इसे कहते हैं

Posted On:- 2026-08-13




सुनील दास

राजनीति में एक हार-जीत तो चुनाव की होती है।इसमें हार-जीत का फैसला जनता करती है।किसे जिताना है यह जनता तय करती है और किसे हराना है यह भी जनता तय करती है।यह जीत-हार पांच साल में एक बार होती है। इसके बाद भी राजनीतिक दलों के बीच हार-जीत का सिलसिला संसद व विधानसभा में भी पांच साल चलता रहता है।चुनाव में हारा हुआ राजनीतिक दल हार से इतना कुंठित रहता है कि उसे जब भी मौका मिलता है तो वह सत्तारूढ़ दल को हराने का प्रयास करता है, उसके हर काम की आलोचना करता है,आए दिन उसे गलत बताने का प्रयास करता है।वह सत्तारूढ़ दल को पांच साल हरा तो नहीं पाता है लेकिन वाकआउट कर,चर्चा से भागकर,संसद व विधानसभा न चलने देकर कोई माने या न माने वह मान लेता है कि उसने सत्तारूढ़ दल को हरा दिया है,सरकार को हरा दिया है,सीएम व पीएम को हरा दिया है,गृहमंत्री को दोषी साबित कर दिया है।
राहुल गांधी कई चुनाव हार चुके हैं, वह कांग्रेस के सबसे ज्यादा चुनाव हारने वाले नेता है। इतने चुनाव आज तक कोई कांग्रेस नेता नहीं हारा है,सब जानते हैं और मानते हैं कि राहुल गांधी चुनाव हारे ज्यादा है लेकिन राहुल गांधी नहीं मानते कि वह चुनाव हारते है क्योंकि वह मानते हैं कि चुनाव वह हार नहीं सकते, उनको चुनाव कोई हरा नहीं सकता,उनको तो चुनाव हराया जाता है,उनको तो वोट चोरी कर चुनाव हराया जाता है,उनको तो चुनाव आयोग वोटों में गड़बड़ी कर चुनाव हरा देता है। वह तो ९९ सीट जीतकर मानते हैं वह जीते हैं, वह तो मानते हैं कि मोदी २४० सीट जीतकर हारे हैं।राहुल गांधी चुनाव हारने के कारण कमजोर नेता है लेकिन वह यह नहीं स्वीकारेंगे वह कहेंगे कि मोदी कमजोर नेता है।वह सरकार गिरा नहीं पाते लेकिन कहेंगे कि सरकार गिर जाएगी,वह खुद पीएम बन नहीं पा रहे हैं लेकिन कहेंगे कि पीएम मोदी ज्यादा दिन पीएम नहीं रहेंगे।
राहुल गांधी चुनाव के बाद चुनाव हारते चले आ रहे है।चुनाव में तो वह मोदी व शाह को हरा नहीं पा रहे हैं तो वह संसद के भीतर उनको बातों के जरिए,संसद न चलने देकर, बहस व चर्चा न होने देकर हराने का प्रयास करते हैं, वह काेई कानून पास न होने देकर मानते हैं कि उन्होंने मोदी व शाह को हरा दिया है।
पिछले कई संसद सत्र हो गए राहुल गांधी का कोई काम देश के लोगों को याद रहे या न रहे लोगों को हर संसद सत्र के बाद यह जरूर याद रहता है कि इस बार भी संसद सत्र राहुल गांधी ने नही चलने दिया।राहुल गांधी के लिए यह कोई बुरी बात नहीं है कि देश की संसद में देश की समस्या पर कोई बहस नहीं होती है, कोई समाधान नहीं निकाला जाता है,नए बनाए कानून पर कोई बहस नहीं होती है और सरकार संसद नहीं चलने के कारण हर संसद सत्र में कई कानून बनाती है और संसद में बिना बहस के पास करा लेती है।सरकार तो चाहती है कि हर कानून पर संसद में बहस हो, उसमें विपक्ष भी कुछ सुझाव दे लेकिन राहुल गांधी की दिलचस्पी कानून पर बहस की जगह मोदी को हराने में रहती है और वह समझते हैं कि संसद चलाना सरकार का काम है और वह चला नहीं पा रही है तो यह सरकार की हार है,पीएम मोदी की हार है, शाह की हार है।
पीेएम मोदी व शाह समझ गए हैं कि राहुल गांधी की कमजोरी यह है कि वह चुनाव नहीं जीत पाते हैं तो संसद में कुछ भी करके,कुछ भी कहके,किसी भी मुद्दे को गंभीर मुद्दा बनाकर वह संसद नहीं चलने देकर और संसद के भीतर व बाहर विवादास्पद बयान देकर चर्चा में बने रहने को अपनी जीत मानते हैं तो पीएम मोदी व शाह भी जब तक जरूरी नहीं होता है संसद में आकर कुछ नहीं कहते हैं,जब संसद चलनी ही नहीं है तो पीएम मोदी व शाह के संसद आने से भी कोई फायदा तो होना नही हैं, वह जानबूझकर संसद नहीं आते हैं और राहुल गांधी जो करना चाहते हैं,उनको लंबे समय तक करने देते हैं, इससे पीएम मोदी व शाह को तो कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन राहुल गांधी खुद ही संसद न चलने देकर रोज एक्सपोज होते रहते हैं। दिल्ली में पैलेट गन चलने और प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज को राहुल गांधी ने इस बार बड़ा मुद्दा बना लिया। इसके लिए उन्होंने मांग की पीएम मोदी को छात्रों से माफी मांगने चाहिए और अमित शाह को संसद में आकर बताना चाहिए कि पैलेट गन चलाने आदेश किसने दिया.।
राहुल गांधी के वहम हो गया था कि वह जैसा चाहेंगे वैसा पीएम मोदी व शाह करने को मजबूर हो जाएंगे। वह पीएम मोदी,शाह को संसद में झुकने को कहेंगे और वह झुक जाएंगे लेकिन ऐसा न पहले हुआ है और न इस बार संसद में हुआ। पीएम मोदी व शाह ने जेनजी की नाराजगी को अपने तरीके से दूर करने का प्रयास किया।वह जो चाहते थे, जल्दी जो हो सकता था वह कानून बनाकर,प्रधान का इस्तीफा लेकर कर दिया और जो बाद में हो सकता है, उसके लिए देश के बड़े व जाने माने लोगों की समिति बना दी है। संसद के भीतर वह राहुल गांधी को वह एहसास दिलाते रहे संसद में न आकर कि राहुल गांधी इस बार उन पर भारी पड़ रहे हैं। पीएम मोदी व अमित शाह वाकई डर गए हैं और डर के मारे संसद नहीं आ रहे हैं।राहुल गांधी को अमित शाह ने मुगालते में रखा और राहुल गांधी मुगालते मे रहे कि अमित शाह संसद आ ही नहीं सकते और संसद सत्र समाप्त होने के एक दिन पहले अमित शाह संसद आए और कह दिया वह राहुल गांधी के उठाए हर मुद्दे का जवाब देने को तैयार हैं।यह राहुल गांधी के लिए अप्रत्याशित था और उन्होंने वही किया जो अमित शाह चाहते थे। राहुल गांधी ने कहा कि  अमित शाह की काल्पनिक बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है।यह कहकर राहुल गांधी जीती हुई बाजी हार गए,उनके यह कहने से उनकी बीस दिन की मेहनत पर पानी फिर गया।हुआ वही जो अमित शाह व पीएम मोदी चाहते थे यानी संसद के भीतर वह छात्रों,लाठीचार्ज व पैलेट गन पर कुछ बोलना नहीं चाहते थे। राहुल गांधी उनके कुछ कहलवाना चाहते थे सफल कौन हुआ। सफल तो पीएम मोदी व शाह हुए,असफल राहुल गांधी हुए। इसे कहते है जीतते जीतते खुद की गलती से हार जाना।



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