सरकार यही चाहती थी कि सब खुद ही एक्सपोज हों

Posted On:- 2026-07-24




सुनील दास

नीट पेपर लीक को लेकर चौतरफा सरकार की आलोचना हो रही है कि सरकार ने इसे शुरू में गंभीरता से नहीं लिया। युवाओं के साथ बातचीत क्योंं नहीं की।युवाओं की मांगों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया। उनकी जो मांगें पूरी की जा सकती हैं,उसे पूरा करने में देरी क्यों की गई।पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठी चार्ज क्यों किया। जितने मुंह उतनी बातें सरकार के खिलाफ की जा रही है। यानी आंदोलन के उग्र व अनियंत्रित होने के लिए सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है।कोई भी सरकार हो वह ठीक समय पर देशहित व जनहित व सरकार के हित में जो करना होता है,करती है।मोदी सरकार ने भी यही किया है। उसने इंतजार किया कि आंदोलन कितना गंभीर है,वह चाहते क्या हैं,विपक्ष इसका राजनीतिक लाभ उठा सकता है या नहीं,शुरू में आंदोलन जब कमजोर था तो उसे सरकार ने ज्यादा महत्व नहीं दिया।वांगचुक के अनशन से आंदोलन को देश में महत्व मिला, भीड़ जुटनी शुरू हुई।वांगचुक के अनशन के बाद भी विपक्ष जो आंदोलन से जुड़ने को तैयार न था, समर्थन देना शुरू किया। राहुल गांधी के अलग आंदोलन शुरू किया। आंदोलन को लेकर विपक्ष बंट गया तो इतने दिनों में सब सरकार के कुछ किए बिना जनता व देश के सामने एक्सपोज हो गए कि वह आंदोलन करके परीक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं चाहते हैं, वह तो इसकी आड़ में संसद के बाहर व संसद के भीतर  हंगामा करना चाहते है, अराजकता फैलाना चाहते हैं। देश में युवाओं के नाम पर नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं।

मोदी सरकार को सीजेपी व वांगचुक की मांगों को जानने के बाद ही यह पता चल गया था कि इनकी कोई बड़ी मांग नहीं है, इनकी मांगें तो  कभी भी पूरी की जा सकती है। यह तो सिर्फ यह चाहते हैं कि सरकार उनकी कुछ मांगे मान लें तो वह कह सके कि उनका आंदोलन सफल रहा।कोर्ट के आदेश से सरकार को पहला मौका मिला सीजेपी व वांगचुक को अलग करने का और वह इसमें सफल रही।इससे दोनों के बीच समन्वय न रहा, सीजेपी कुछ मांग कर रही थी और वांगचुक कुछ और मांग कर रहे थे,सरकार ने मोर्चे को दो मोर्चे में बांटकर पहले आंदोलन को कमजोर किया। वह जानती थी कि वांगचुक का अनशन आंदोलन की बड़ी ताकत है और उसने वांगचुक से बात कर उनकी कुछ मांगों को मानकर उनका अनशन समाप्त कर आंदोलन की ताकत को कम कर दिया है। इसके बात सीजेपी के नेताओं से बातों का सिलसिला जारी है। वह एक मांग पर अ़ड़े हैं कि शिक्षामंत्री का इस्तीफा होना चाहिए।सरकार भी इस मांग को जानबुझकर पूरा नहीं कर रही है और इसका परिणाम यह हुआ है कि अब विपक्ष का सारा जोर भी इसी बात पर है कि शिक्षामंत्री का इस्तीफा होना चाहिए यानी सरकार ने शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग को दोनों की मांग बना दिया है।

सरकार यदि शुरू में ही सीजेपी,राहुल गांधी की शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग को मान लेती तो वह नीट पेपर लीक,छात्रों पर लाठीचार्ज के नाम पर पीएम से इस्तीफे की मांग पर आ जाते।यानी विपक्ष तो ऐसी मांग ही करने वाला था कि पीएम मोदी जिसे पूरा न करे। मोदी सरकार ने शिक्षामंत्री का इस्तीफा न लेकर यह साफ कर दिया है कि वह सीजेपी व कांग्रेस की इस मांग को पूरा नही करने वाली हैं। इससे हुआ यह है कि अब सीजेपी व कांग्रेस दोनों की एक ही मांग हो गई है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा होने पर आंदोलन खत्म होगा, विपक्ष संसद मे चर्चा में भाग लेगा। संसद को चलने देगा। सरकार यह मांग तो कभी भी पूरा कर सकती है। लेकिन वह इस आंदोलन को भीड़तंत्र की अराजकता में बदलने दे रही है ताकि वह जब यह कहे कि यह आंदोलन शिक्षा परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नहीं बल्कि पड़ोस के देशों की तरह देश में अराजकता फैलाना है, सरकार को अस्थिर करना है। देस में राजनीतिक अस्थिरता का दौर लाना है तो लोगों का भरोसा हो कि सरकार सच कह रही है और विपक्ष वाकई में देश में अराजकता फैलाना की इच्छा रखता है।

पीएम मोदी ने आंदोलन को लंबा खींचकर यह तो साबित कर दिया है कि आंदोलन करने वाले शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था मे सुधार नहीं चाहते हैं। वह तो शिक्षामंत्री का इस्तीफा चाहते हैं ताकि यह साबित हो सके कि उनका आंदोलन सफल रहा।सीजेपी का लक्ष्य अपने आंदोलन को सफल बताना है। कांग्रेस का लक्ष्य शिक्षामंत्री का इस्तीफा कराकर सरकार को झुकाना है।सरकार झुकती है तो राहुल गांधी को बहुत अच्छा लगता है कि चुनाव में न सही संसद में तो वह मोदी सरकार को बार बार हरा रही है।सरकार कभी भी दोनों की एक मांग को पूरा कर गतिरोध को समाप्त कर सकती है लेकिन इससे पहले वह देश के युवाओं को बताना चाहती है कि शिक्षा व परीक्षा की प्रणाली में खामी है तो उसके लिए पहले कांग्रेस भी दोषी है, कांग्रेस सरकार चाहती तो इस प्रणाली को सुधार सकती थी लेकिन उसने नहीं सुधारा हम सुधारना चाहते हैं और इसी वजह से नया कानून मोदी सरकार ला रही है और पेपर लीक मामले में कडी सजा का प्रावधान करने जा रही है। यानी वह किसी दिन शिक्षामंत्री का इस्तीफा लेकर आंदोलन को समाप्त कर सकती है,संसद में गतिरोध का समाप्त कर सकती है और पेपर लीक रोकने नया कानून लाकर यह देश को बताना चाहती है कि शिक्षा हो परीक्षा व्यवस्था में सुधार मोदी सरकार ही कर सकती है और वह ऐसा करने जा रही है।



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