विपक्ष में राहुल के लिए चुनौती बस केजरीवाल हैं

Posted On:- 2026-07-22




सुनील दास

देश की राजनीति में कांग्रेस का दबदबा खत्म होने के बाद कांग्रेस व राज्यों के क्षेत्रीय दलों के बीच अजब रिश्ता है।वह एकजुट भी होना चाहते हैं और आपस मे लड़ते भी रहते हैं। उनका लक्ष्य पीएम मोदी व भाजपा को केंद्र व राज्यों में हराना भी है और राज्यों में खुद को मजबूत भी करना है।जब कांग्रेस केंद्र व राज्यों में मजबूत हुआ करती थी तो क्षेत्रीय दल व नेता कमजोर हुआ करते थे।केंद्र व राज्यों मे कांग्रेस कमजोर हुई तो क्षेत्रीय दल मजबूत हुए,क्षेत्रीय दलों के नेता मजबूत हुए।वह राष्ट्रीय नेता के तौर पर जाने जाने लगे।यानी उनका संबंध ऐसा है कि एक मजबूत होगा तो दूसरे का कमजोर होना जरूरी है।एक कमजोर होगा तो दूसरे का मजबूत होना जरूरी है।हाल के चुनाव में बिहार व बंगाल में क्षेत्रीय दलों के हारने से राज्यों में भाजपा तो मजबूत हुई है।क्षेत्रीय दल कमजोर हुए और मजे की बात है माना जा रहा है कि पं.बंगाल में अब कांग्रेस मजबूत हो सकती है, वह टीएमसी की जगह ले सकती है और आने वालों दिनों में विपक्ष की भूमिका में आ सकती है।

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के लिए विपक्ष के कई नेता चुनौती बने रहे हैं। उनके कारण वह विपक्ष के मजबूत नेता के रूप में नही उभर सके हैं,अपनी बात क्षेत्रीय दलों से मनवा नहीं पाते थे।कभी शरद पवार उनके विरोध में खड़े हो जाते थे,कभी ममता उनके विरोध में सामनेे आ जाती थी। बिहार में लालू परिवार उनके रास्ते में आ जाता था।यूपी मे अखिलेश कांग्रेस को मजबूत नहीं होने देना चाहते हैं।बिहार,बंगाल में भाजपा की जीत,महाराष्ट्र मे शरद पवार व उध्दव ठाकरे की पार्टी टूटने,बंगाल में ममता के कमजोर होने का लाभ कांग्रेस और राहुल गांधी को यह हुआ है कि विपक्ष में उनको चुनौती देने वाले नेताओं की संख्या कम होती गई है।केरल व तमिलनाडु में चुनाव के बाद कांग्रेस राजनीतिक रूप से मजबूत हुई है। राहुल गांधी अब विपक्ष के सबसे मजबूत व बड़े नेता हैं।उऩके सामने अब विपक्ष में कोई मजबूत नेता है तो वह अरविंद केजरीवाल हैं।यानी राहुल गांधी को देश की राजनीति, पंजाब सहित कई राज्यों में अरविंद केजरीवाल ही चुनौती दे सकते हैं।

सीजेपी आंदोलन के चलते हुए युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने के लिए राहुल गांधी व केजरीवाल के बीच होड़ सी लगी हुई है कि युवाओं का सबसे बड़ा हितैषी कौन है।सीजेपी के आंदोलन को विपक्ष के बड़े नेताओं मे सबसे पहले समर्थन देने केजरीवाल जंतरमंतर पहुंचे थे। उनके अलावा आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, आतिशी मारलेना आदि नेता भी पहुंचे थे। उसके बाद दूसरे राजनीतिक दल पहुंचे और सबसे आखिरी में कांग्रेस ने पवन खेड़ा जैसे नेता को भेजकर समर्थन करने की औपचारिकता पूरी की थी। इससे ऐसा लग रहा था कि पेपरलीक,शिक्षामंत्री के इस्तीफे को लेकर एक ही आंदोलन होगा। कांग्रेस नेता भी जंतर मंतर के आकर आंदोलन में शामिल होंगे। सीजेपी के संसद मार्च, पुलिस के लाठी चार्ज के बाद राहुल गांधी व केजरीवाल के बीच युवाओं के बीच जगह बनाने को लेकर फिर से नई होड़ शुरू हो गई। केजरीवाल ने लाठीचार्ज की निंदा की, घायलों के इलाज व लीगल सहायता की घोषणा की,अस्पताल घायल युवाओं को देखने गए तो राहुलगांधी ने पीएम आवास के पास धऱना दिया,घायलों को देखने अस्पताल भी गए और साफ कर दिया उनका युवाओं के लिए आंदोलन सीजेपी के आंदोलन से अलग है।

अब सीजेपी सरकार से अलग मांग कर रही है और कांग्रेस सरकार से अलग मांग कर रही है।ऐसे मे केजरीवाल ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह युवाओं के आंदोलन को कमजोर कर रही है और वह भाजपा व मोदी से मिली हुई है।सीजेपी भी शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है और कांग्रेस भी शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग कर रही है। इससे माना जा रहा है कि कांग्रेस ऐसा इसलिए कर रही है ताकि इस मामले में वह आप से आगे रह सके।सीजेपी आप वाले माने जा रहे हैं और माना जा रहा है कि सीजेपी के आंदोलन का लाभ केजरीवाल को होगा।वह देश में युवाओं के मजबूत नेता के रूप में उभर कर सामने आएंगे। राहुल गांधी यही नहीं चाहते हैं कि विपक्ष मे उनके लिए जो बड़ी चुनौती केजरीवाल है, वह और बड़ी चुनौती बने। केजरीवाल को और बड़ी चुनौती न बनने देने के लिए जरूरी है कि पंजाब में केजरीवाल की हार हो। जैसे यूपी मे अखिलेश,बिहार में तेजस्वी और बंगाल में ममता की हार बाद उनका राजनीतिक कद कम हुआ है, उसी तरह केजरीवाल यदि पंजाब में हारते है तो उनका राजनीतिक कद दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह कम हो जाएगा और राहुल गांधी का कद विपक्ष के तमाम नेताओं की तुलना मेंं बढ़ जाएगा। तब वह विपक्ष की तरफ से पीएम पद के स्वाभाविक दावेदार माने जाएँगे।

राहुल गांधी को युवाओं के मजबूत नेता के रूप में पेश करने के लिए पीएम आवास के सामने धरना दिया गया है, मुख्य विपक्षी दल होने के बाद भी उसे सीजेपी के रास्ते पर चलना पड़ रहा है। केंद्र की सत्ता चलाने का लंबा अनुभव रखने वाली कांग्रेस संसद के बजाय सड़क पर उतर अपनी बात रख रही है तो इससे साफ हो जाता है कि वह चाहती क्या है, उसका लक्ष्य क्या है। लोकतंत्र में सड़क की राजनीति भी होती है, लेकिन कांग्रेस ने कभी संसद की जगह सड़क को ज्यादा महत्व नहीं दिया है, अब दे रही है तो इसका मतलब साफ है कि मौका है तो इसका लाभ क्यों न उठाया जाए।केजरीवाल सड़क की राजनीति करते हैं, उनको मात सड़क की राजनीति करके दिया जा सकता है।दिल्ली में तीन बार और एक बार पंजाब मे कांग्रेस को हराकर केजरीवाल राहुल गांधी से बडे़ नेता तो हैं, राहुल गांधी उनको पंजाब चुनाव में हराकर खुद को बड़ा नेता साबित करना चाहते हैं और अपने रास्ते की एक और बड़ी बाधा को दूर करना चाहते हैं।



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