राजनीति देश की अलग होती है और राज्यों की अलग होती है।यह कड़वी सच्चाई है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। विपक्ष के ज्यादातर राजनीतिक दल दो तरह की राजनीति करते हैं, वह देश की राजनीति में एकजुट होने प्रयास करते हैं, बैठक करते हैं और साबित करने का प्रयास भी करते हैं कि वह देश की राजनीति में भाजपा व मोदी सरकार को हराने के लिए एकजुट हैं।जैसे ही राज्यों के चुनाव होते हैं तो उनकी यह एकजुटता हमेशा सवालों के घेरे में होती है,तब राज्य की राजनीति में अपना हित सबसे प्रमुख हो जाता है और एकजुटता को सब भूल जाते हैं।भूल जाते हैं कि देश की राजनीति में भाजपा व पीएम मोदी को हराना है, राज्य के चुनाव में एक ही बात याद रहती है कि सबसे ज्यादा सीटों पर हमको चुनाव लड़ना है और राज्य में एक नंबर नहीं तो दो नंबर की पार्टी बने रहना है।
राज्यों के चुनाव का एक दौर समाप्त हो चुका है और फिर से २०२७ में चुनाव का एक दौर शुरू होने वाला है। जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं वहां के हारे हुए राजनीतिक दलों को हारने के बाद राहुल गांधी व कांग्रेस की तरह यकीन हो गया है कि चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव में जीता देता है, हम चुनाव हारे नहीं है हमको तो चुनाव में चुनाव आयोग ने हराया है,चुनाव आयोग ने भाजपा को जिताने के लिए निष्पक्ष चुनाव नहीं कराया है। कोई मान नहीं रहा है कि अपनी कमजोरियों के कारण चुनाव हारे हैं। वोट चोरी हुई है इसलिए चुनाव हारे हैं। हर चुनाव में वोट चोरी हो रही है,इसलिए भाजपा जीत रही है और विपक्ष के दल हार रहे हैं।कोई पूछे कि वोट चोरी कैसे हुई है तो कोई बता नहीं पाता है।जनता को समझ नहीं आ रहा है कि उसका वोट कैसे चोरी हुआ है और जनता को कोई समझा नहीं पा रहा है कि वोट चोरी कैसे हो रहा है। हो रहा है तो देश के सारे राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं, उनको पता है तो रोक क्यों नहीं रहेे हैं।
विपक्ष को वोट चोरी हो रही है तो उसका पहला काम तो एकजुट होकर वोट चोरी को रोकने का होना चाहिए।इस काम को वह जरूरी नहीं मानता है, उसके लिए सबसे जरूरी काम है कि चुनाव आयोग पर आरोप लगाने के लिए एकजुट होना। उसने तय किया है कि ३० सिंतबर को चुनाव आयोग पर एकजुट होकर आरोप लगाने के लिए बैठक की जाएगी। हमेशा की तरह बैठक मे एकजुट होने का दिखावा किया जाएगा। बयान जारी किया जाएगा कि हम चुनाव आयोग पर आरोप लगाने के लिए एकजुट हैं। हम मानते हैं कि हम चुनाव हारे नहीं है, हमको चुनाव आयोग ने भाजपा को चुनाव जीताने के लिए चुनाव में गड़बड़ी कर हराने का काम किया है। विपक्ष के ज्यादातर दलों का एक ही तो दुख है कि वह चुनाव हार गए हैं।चुनाव हारने का मतलब होता है कि जनता ने भरोसा नहीं किया लेकिन विपक्ष के दल कैसे अपने मुंह से कहे कि जनता ने उनपर भऱोसा नहीं किया।इसलिए मजबूरी में उनको यह झूठ कहना पड़ रहा है कि हम पर तो जनता भरोसा करती है लेकिन वोट चोरी कर हमको हराया गया है।
फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब चुनाव आयोग उनको वोट चोरी कर हराता है तो सभी राज्यों के चुनाव में क्यों नहीं हराता है।जम्मू कश्मीर, झारखंड, पंजाब, हिमाचल, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल में कैसे विपक्षी दल चुनाव जीत जाते हैं।२४ के लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग भाजपा को चौर सौ के पार क्यों नहीं कर पाता है,यूपी में भाजपा कैसे कम सीटे लाती हैं। भाजपा क्यों २४० सीट पर अटक जाती है।विपक्ष को मालूम है कि दिल्ली की एकजुटता का कोई मतलब नहीं है क्योंकि देश का चुनाव तो अभी होना नहीं है लेकिन चुनाव आयोग के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन करना है इसलिए ३० सितंबर को दिल्ली बैठक होगी और साथ ही यूपी में कांग्रेस व सपा के बीच सीटों को लेकर अघोषित लड़ाई भी चलती रहेगी।
कायदे से एकजुटता तो राज्यों में होनी चाहिए, विपक्षी दलों की हार का एक बड़ा कारण राज्यों के चुनाव मे एकजुट न होना रहा है लेकिन इसे कोई स्वीकार नहीं करता है।यहां तो बड़ा भाई व छोटा भाई की लड़ाई होती है। क्षेत्रीयदल कांग्रेस को सहयोग बनाए रखना चाहते हैं और कांग्रेस दिल्ली की राजनीति में बड़ा भाई होने के कारण राज्यों में अब कम सीटें नहीं आधी सीटें मांग रही है।कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि उसे यूपी में १५० सीटें चाहिए। अब सपा के सुप्रीमो अखिलेश यादव कह नहीं सकते कि इतनी सीटें तो देंगे नहीं लेकिन इशारों में यह संदेश तो दे ही सकते हैं कि राज्य में कांग्रेस की हैसियत नहीं है कि वह १५०सीटों पर चुनाव लड़े और जीत सके।अंत में होगा क्या,होगा वही जो बिहार में हुआ।कांग्रेस व राजद दोनों चुनाव हारे। होगा वही जो बंगाल में हुआ टीेेएमसी भी हारी और कांग्रेस भी हारी।
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