कोई भी नेता हो,किसी भी क्षेत्र का नेता हो, किसी भी राजनीतिक दल का नेता हो,वह अगर कोई बात जनता को समझाना चाहता है तो पहली शर्त तो यही होती है कि उसे पता रहना कि वह अपनी बात को जनता को कैसे समझा सकता है, कौन सी भाषा में समझा सकता है। देश के ज्यादातर लोग हिंदी समझते हैं तो अगर वह अपनी बात हिंदी में कहें और सरल भाषा में कहे तो उसकी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों को समझ आ सकती है,लेकिन यदि वह अपनी बात अंग्रेजी में कहता है तो उसकी बातों को सुनकर ज्यादातर लोग तो समझ ही नहीं पाएंगे कि वह क्या कह रहे हैं। कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी की विशेषता या कमजोरी यही है कि वह अपनी बात अंग्रेजी में कहकर देश के लोगों को समझाना चाहते हैं और वह जो कहते हैं वह स्पष्ट नहीं होता है,सरल नहीं होता है,वह कहना कुछ चाहते हैं और कह कुछ जाते हैं। वह कोई बात कहकर लोगों को कुछ समझाना चाहते हैं और वह जो समझाना चाहते हैं, वह लोगों को समझ नहीं आता है।
देश के एक अखबार में एक आर्टिकल प्रकाशित हुआ है जिसमें बताया गया कि कई बातों को लेकर ज्ञानेश कुमार व दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच सहमति नही थी।जब तक चुनाव आयोग की तरफ से स्पष्टीकरण नहीं आया तो लोगों ने इसका मतलब यह निकाल लिया कि हाल के कुछ बरसों में जितने फैसले किए गए हैं,वह ज्ञानेश कुमार ने अकेले कर लिए हैं। इसलिए सारे फैसले गलत है,अवैध हैं। चुनाव आयोग ने माना कई बार कोई अंतिम फैसला लेने के पहले कई बातों पर सहमति नहीं होती है यानी असहमति अंतिम फैसला लेने के पहले होती है लेकिन जब अंतिम फैसला लिया जाता है तो उन बातों पर सहमति बनती है और सहमति बनने के बाद ही अंंतिम फैसला लिया जाता है और लिया गया है। यानी चुनाव आयोग के मुताबिक सारे फैसले आमसहमति से लिए गए हैं।यह बात सच भी है क्योंकि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कोई शिकायत राष्ट्रपति से की है, न दोनों ने कोई बयान जारी किया है, न ही अंग्रेजी अखबार के आर्टिकल प्रकाशित करने के बाद कुछ कहा है।
राहुल गांधी गांधी परिवार के सदस्य हैं,नेता प्रतिपक्ष हैं,उनको जो कुछ करना हो या कहना हो तो जरा सोच समझकर पूरी जांच कर कोई बात कहनी चाहिए और सबूतों के साथ कहनी चाहिए ताकि लोग उस पर भरोसा कर सकें।कई बार राहुल गांधी जल्दी में जो कुछ उनके आसपास के लोग उनको समझा देते हैं, वही कहते हैं और वह भी स्पष्ट नहीं कह पाते हैं, इसलिए उनकी बातें विश्वसनीय नहीं लगती है।दो चुनाव आयुक्त के बारें में जैसे ही खबर आई राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस बुला लिया.यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह कितनी सच है,कहीं आधा सच तो नहीं है।राहुल गांधी ने कहा कि मैं पिछले तीन साल से वोट चोरी का आरोप लगा रहा हूं,अब दो चुनाव आयुक्त भी इसमें मेरे साथ हैं।चुऩाव आयुक्त खुद स्वीकार कर रहे हैं कि वोट चोरी हुई है।ज्ञानेश कुमार ने देश द्रोह किया है,वह इस्तीफा देकर गवाह बन जाएं,उनके लिए यही देशभक्ति होगी।
दोनो चुनाव आयुक्त की तरफ से अभीतक कोई बयान नहीं आया है कि वह नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ है या ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हैं। ऐसे में राहुल गांधी के यह कहने पर कोई कैसे यकीन कर सकता है कि दोनों चुनाव आयुक्त राहुल गांधी के साथ है और उन्होंने स्वीकार किया है कि राहुल गांधी कहते हैं कि वोट चोरी हुई है तो यह सच है,वाकई में वोट चोरी हुई है। राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त को डराने का प्रयास भी कर रहे हैं कि अगर वह इस्तीफा नहीं देंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।वह उनके साथ आकर गवाह बन जाएंगे तो उनको देशभक्त माना जाएगा।यानी की राहुल गांधी दिवास्वप्न देख रहे हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त उनके साथ आ जाएंगे और कह देंगे कि हां उन्होंने पीएम मोदी व शाह के कहने पर वोट चोरी कराई है। राहुल गांधी इस तरह के सपने पहले भी देखते रहे हैं और कहते रहे हैं कि मोदी सरकार कमजाेर सरकार है, एक साल में गिर जाएगी। राहुल गांधी का यह सपना पूरा नहीं हुआ है,अब सपना देख रहे है कि चुनाव आयुक्त उनके साथ है,उनके साथ आ जाएंगे।
राहुल गांधी कुछ कहते हैं तो उनको पूरी जानकारी लेकर कहनी चाहिए लेकिन वह ऐसा नहीं करते हैं और भाजपा को कहने का मौका मिलता है कि राहुल गांधी को पूरी जानकारी नहीं है।हाल के प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने फिर ऐसा ही किया जब उन्होंने कहा कि भारत में एक सत्ताविरोधी लहर नाम की बुनियादी ताकत होती है,वह हर सरकार के खिलाफ होती है लेकिन १२ साल से मोदी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर क्यों नहीं दिखती है।जहां तक सत्ता विरोधी लहर न होने की बात है तो कांग्रेस ने ५० साल तक देश व राज्यों में सत्ता में रहीं है,पं.बंगाल में वामपंथी सरकार ३४ साल रही है,ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार २४ साल रही है। पं. बंगाल में १५ साल ममता सरकार रही है,बिहार में १५ साल लालू यादव की सरकार रही है।छत्तीसगढ़ में १५ साल रमन सरकार रही है, दिल्ली मे १० साल आप की सरकार रही है।सत्ता विरोधी लहर सिर्फ भाजपा सरकार के खिलाफ नहीं रही हैं,कई सरकारों के खिलाफ नहीं रही है तो इस कारण उन्होंने कुछ ऐसे काम किए थे कि जनता ने उनको कई बार सत्ता सौंपी।
यह भी सच नहीं है कि देश में भाजपा सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर नहीं थी,सत्ता विरोधी लहर थी तब ही तो २०२४ मे मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर थी तब ही तो कांग्रेस २०१८ में छत्तीसगढ़. मप्र, राजस्थान में जीती।सत्ता विरोधी लहर थी तब ही भाजपा हिमाचल,कर्नाटक,तेलंगाना हारी और कांग्रेस जीती।कश्मीर हारी,झारखंड हारी,केरल हारी।कोई राजनीतिक दल लंबे समय तक कई राज्यों में सत्ता मे रहता है तो इसका मतलब यह नहीं होता कि वह कुछ गलत काम करने के कारण सत्ता पर है,इसका मतलब यह भी होता है कि उसने अच्छे काम किए हैं, जनता उसके काम संतुष्ट है,यहभी हो सकता है कि राज्य या देश में उसका कोई अच्छा विकल्प न हो। कई राज्यों में तीन दशक से कांग्रेस सत्ता में नही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वहां कोई जीत रहा है तो वोट चोरी करके जीत रहा है, इसका मतलब तो यह भी होता है कि वहां की जनता कांग्रेस को उस राजनीतिक दल का विकल्प नहीं मान रही है। इसका मतलब तो यह भी होता है कि राहुल गांधी को मोदी से अच्छा नेता नहीं मान रही है।
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