छात्रों की खुदकुशी गंभीर समस्या है तो समाधान क्या है.....

Posted On:- 2026-09-23




सुनील दास

कहीं कोटा में कोचिंग करने वाले छात्र आत्महत्या करते हैं तो कही आईटीआई जैसी शिक्षा के उच्चस्तरीय संस्थानों में भी छात्र आत्महत्या करते हैं। छात्र चाहे किसी भी स्तर का हो,वह आत्महत्या कर रहा है तो यह गंभीर समस्या तो है, परिवार के लिए भी,समाज के लिए भी.राज्य के लिए भी,सरकार के लिए भी और शिक्षा संस्थानों के लिए भी।यह सभी के लिए समस्या है तो इसका समाधान भी सभी को मिलकर करना चाहिए। इस समस्या का समाधान छात्रों की समस्या समझकर ही किया जा सकता है। कई बार  क्या होता है कि समस्या तो छात्रों की रहती है,लेकिन कोई परिवार समस्या का कारण शिक्षक को मान लेता है, कुछ छात्र उसे संस्थान की समस्या मान लेते हैं।ऐसे में समस्या का समाधान होने की जगह समस्या और जटिल हो जाती है।परिवार इसे जातिगत भेदभाव का मामला बना देता है।संस्थान इसे जातिगत भेदभाव का मामला नहीं मानता है।छात्र मानते हैं कि संस्थान की व्यवस्था ठीक न होना समस्या की जड़ है।
एक समस्या को सब अलग अलग नजरिए से देखते हैं तो मूल समस्या कहीं पीछे छूट जाती है और चर्चा दूसरे मामलों में ज्यादा होने लगती है।कोई छात्र के पक्ष में खड़ा हो जाता है,कोई शिक्षक के पक्ष में खड़ा हो जाता है कोई संस्थान की उत्कृष्टता की बात करता है। कोई पीड़ित परिवार के पक्ष में खड़ा हो जाता है।मुंबई आईटीआई में एक छात्र ने खुदकुशी कर ली है।भविष्य़ में कोई छात्र खुदकुशी न करे।यह समस्या है,इसका समाधान परिवार,छात्र,शिक्षक,संस्थान चारों को करना है।समस्या के समाधान के लिए खुदकुशी के कारणों को जानना जरूरी है।यह काम परिवार,छात्र,शिक्षक,संस्थान सभी को करना चाहिए।छात्र से सभी बात करते रहें, उसकी परेशानी व उसके तनाव को जानने का प्रयास करते रहें तो समय से पहले जाना जा सकता है कि छात्र संस्थान में असहज है,तनावग्रस्त है तो क्यों है।
मोटे तौर पर एक कारण तो यह माना जाता है कि छात्र प्रतिस्पर्धा के कारण सबसे ज्यादा तनाव में रहता है। उच्च शिक्षा संस्थान में भेजते वक्त सबसे पहले परिवार की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने बच्चे को जिस उच्च शिक्षा संस्थान में पढ़ने भेज रहा है,वह भेजने से पहले जान ले कि उसका बच्चा उस उच्च शिक्षा संस्थान में जाकर दूसरे उच्च प्रतिभाशाली बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है या नहीं कर सकता। उन्हें जरा भी शक हो कि उनका बेटा प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है तो वह बच्चे को ऐसे संस्थान में न भेजे। अगर माता पिता अपने बच्चे की क्षमता को जाने बिना बेटे को आईटीआई में भेजते हैं तो बच्चे की खुदकुशी के लिए सबसे पहले तो वही दोषी हैं।इसमें कोई शक नहीं है कि कुछ बच्चे अपने शहर के उच्चे प्रतिभाशाली हो सकते हैं,लेकिन आईटीआई में तो पूरे देश के कई शहरों के ऐसे बच्चे होते हैं। बच्चे को शहर के बच्चो की तुलना में में जब देश के कई शहरों के प्रतिभाशाली बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है तो हो सकता है कि वह उनसे प्रतिस्पर्धा करने में पिछड़ रहा हो।ऐसी स्थिति में बच्चे को तनाव होता है कि वह है तो प्रतिभाशाली लेकिन मुकाबला नहीं कर पा रहा है।ऐसे मे उसकी परेशानी को जानने का काम परिवार, शिक्षक, संस्थान का होता है।छात्रों को कोई परेशानी है तो उसे परिवार,छात्र,शिक्षक संस्थान को बताना चाहिए।इससे उसे मोटिवेट किया जा सकता है,रास्ता बताया जा सकता है यानी मरने से बचाया जा सकता है। समस्या छात्रों का आत्महत्या करना है तो समाधान यह है कि उनको कैसे बचाया जा सकता है।
आंकड़ों के मुताबिक देशभर के 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में 2020-21 से 2024-25 के बीच 45 विद्यार्थियों ने खुदकुशी की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनमें से 28 छात्र एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के थे। संस्थानवार रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा सात आत्महत्याएं आईआईटी हैदराबाद में दर्ज की गईं।देशभर के 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में 2020-21 से 2024-25 के बीच कुल 45 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें से 28 मामले अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदायों से जुड़े छात्रों के थे। आधिकारिक आंकड़ों से यह जानकारी मिली है।ये आंकड़े आठ दिसंबर, 2025 को लोकसभा में पूछे गए एक तारांकित प्रश्न के लिए सभी आईआईटी से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर संकलित किए गए हैं। इन 28 छात्रों की संख्या इस अवधि के दौरान आईआईटी में दर्ज कुल आत्महत्याओं के 62 प्रतिशत से अधिक थी। आत्महत्या करने वाले छात्रों में 12 अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), नौ अनुसूचित जाति (एससी) और सात अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय से थे।वहीं, 16 छात्र सामान्य वर्ग और एक छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) से था।
इऩ आंकड़ों का कोई भी विश्लेषण करेगा तो उसे समझ आ जाएगा कि छात्रों को वर्ग के आधार पर बांटकर बताया जा रहा है कि आरक्षित वर्ग के बच्चों ने ज्यादा आत्महत्या की है।किसने ज्यादा की और किसने कम की है,इससे समस्या का समाधान नहीं हो सकता।छात्रों को वर्ग में बांटकर देखने की जगह छात्र को छात्र के रूप में देखने की जरूरत है। देश में जाति वर्ग की राजनीति इतनी ज्यादा होती है कि छात्रों की समस्या को भी वर्ग की समस्या के रूप में देखा जाता है,इससे समस्या का समाधान तो नहीं होता है, माता-पिता प्रतिभाशाली संतान खोते हैं,संस्थान की बदनामी होती है,प्रतिभाशाली शिक्षकों को परेशानी होती है। शिक्षकों को ऐसा लगता है कि नियमों का पालन करने पर भी उनको सजा मिल सकती है।



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