हिमाचल के 12 गांव जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपना रहे नए तरीके

Posted On:- 2026-11-01




CEEW अध्ययन में सामने आए 25 समाधान

शिमला (वीएनएस)। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच हिमाचल प्रदेश के गांव अपने स्तर पर अनुकूलन के प्रयास कर रहे हैं। कहीं किसान सेब की जगह अनार और जापानी फल की खेती अपना रहे हैं, तो कहीं महिला समूह पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर रहे हैं। कुछ पंचायतों ने आपदा से निपटने के लिए स्थानीय समितियां भी गठित की हैं।

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) और इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की 12 ग्राम पंचायतों पर आधारित इस अध्ययन में 25 अनुकूलन समाधान सुझाए गए हैं, जिन्हें 30 से अधिक सरकारी योजनाओं और नीतियों के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है।

फसल बदल रहे किसान, जल स्रोत सहेज रहीं महिलाएं
अध्ययन के मुताबिक, शिमला जिले की संधू पंचायत में 20 से अधिक परिवार प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं। कुल्लू के बजौरा में किसानों ने फसलों में बदलाव करते हुए जापानी फल (परसिमन) की खेती शुरू की है। वहीं, सिरमौर के परारा में सेब के साथ लहसुन की खेती की जा रही है।

सिरमौर की थाना कशोगा पंचायत में कभी 35 बारहमासी बावड़ियां थीं, जिनमें से अब केवल 10 बची हैं। महिला समूहों ने इन जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का अभियान शुरू किया है। अब तक पांच बावड़ियों को फिर से उपयोगी बनाया जा चुका है।

आपदा प्रबंधन के लिए ग्राम समिति गठित
शिमला के पास शोघी पंचायत ने 2023 की बाढ़ और भूस्खलन के बाद ग्राम आपदा प्रबंधन समिति बनाई। एड्रा इंडिया के सहयोग से गठित इस समिति के माध्यम से ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार और सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण दिया गया है।

शिमला में जारी हुई अध्ययन रिपोर्ट
31 अक्टूबर को शिमला के होटल पीटरहॉफ में आयोजित बहु-हितधारक संवाद में रिपोर्ट जारी की गई। इस अवसर पर एचपीएमसी के प्रबंध निदेशक दुनी चंद राणा, अतिरिक्त सचिव निशांत ठाकुर, इसीमोड की डॉ. अमीना महर्जन और हिमालयन इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेटिव एक्शन के कार्यकारी निदेशक राजीव अहल मौजूद रहे।

अध्ययन में पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को मजबूत करने, जलवायु अनुकूलन को ग्राम पंचायत विकास योजनाओं से जोड़ने और पूर्वानुमान आधारित वित्तपोषण व्यवस्था अपनाने का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य आपदा आने के बाद राहत कार्य करने के बजाय संभावित जोखिमों का पहले से अनुमान लगाकर नुकसान कम करना है।

CEEW की सह-लेखक श्रेया वधावन के मुताबिक, स्थानीय किसानों, महिला समूहों और ग्राम समितियों को सरकारी योजनाओं, कृषि विज्ञान केंद्रों और गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग मिलने से ऐसे प्रयासों को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकता है।



Related News
thumb

जलवायु लक्ष्यों के लिए 10 अरब डॉलर से जुटेंगे 50 अरब डॉलर: CEEW-टाट...

भारत को 2030 तक बिजली, उद्योग और परिवहन क्षेत्रों में कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए करीब 500 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी।


thumb

AI सुरक्षा पर OpenAI सख्त, उन्नत मॉडल्स की ट्रेनिंग से हटाया लाइव इ...

अमेरिकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी OpenAI ने अपने सबसे उन्नत AI मॉडल्स की ट्रेनिंग के दौरान लाइव इंटरनेट एक्सेस पर रोक लगाने का फैसला किया है


thumb

दक्षिण एशिया में बढ़ा गर्मी का खतरा, भारत समेत 4 देशों ने मिलकर बना...

प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहे अभूतपूर्व अल नीनो के बीच दक्षिण एशिया में भीषण गर्मी और उससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर भारत, बांग्लादेश, नेप...


thumb

त्योहारों में खर्च का बढ़ेगा हिसाब! कमर्शियल गैस महंगी, TV-AC से पा...

अक्टूबर महीने की शुरुआत आम लोगों के लिए महंगाई का नया झटका लेकर आई है। त्योहारों के सीजन में जहां उपभोक्ता खरीदारी की तैयारी कर रहे हैं, वहीं कई मह...


thumb

कमर्शियल LPG सिलेंडर 62.50 रुपए महंगा, ATF में भी 16 रुपए की बढ़ोतरी

अक्टूबर की शुरुआत में महंगाई का असर कमर्शियल ईंधन पर पड़ा है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 62...