नयी दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय शिखर सम्मेलन पूरी तरह सफल रहा है।इस सम्मलेन में भारत ग्लोबल साउथ के सबसे भरोसेमंद देश के रूप में सामने आया है। जितने देश इस सम्मेलन में आए वह सब भारत पर भरोसा करते हैं जो देश इस सम्मेलन में नहीं आए वह भी मानते हैं कि कि भारत एक ऐसा देश है जो साउथ ग्लोबल के साथ ही पूरी दुनिया के भले के लिए ईमानदारी से काम कर सकता है।यही वजह है कि पहले दिन ब्रिक्स समूह ने सर्वसम्मति से साझा घोषणापत्र स्वीकार किया।यह आसान नहीं था,सब मानकर चल रह थे कि ईरान और यूएई के बीच पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर जारी गतिरोध के कारण ऐसे नहीं हो सकता लेकिन कई दौर की बातचीत के ऐसा संभव हो सका।यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी है क्योंकि हर सम्मेलन की सफलता का एक पैमाना तो यही होता है कि आम सहमति से एक साझा घोषणापत्र को जारी हो सका या नहीं हो सका।
पीएम मोदी ने सम्मेलन के दौरान जो कहा बदलती दुनियां का सच है इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता कि बदलती दुनिया को पुरानी पड़ चुकी संस्थाओं के जरिए नहीं चलाया जा सकता। प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार जरूरी हैं। ग्लोबल साउथ’ को भविष्य की प्रौद्योगिकियों के विकास और उन्हें संचालित करने वाले नियमों में समान भागीदारी मिलनी चाहिए। फैसलों और उनके परिणामों के बीच के अंतर को साझेदारी और सामूहिक कार्रवाई के जरिए कम किया जाना चाहिए। नयी दिल्ली घोषणापत्र हमारे साझा संकल्प को स्पष्ट दिशा देता है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन प्रस्तावों को ठोस परिणामों में बदलें।
दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में आर्थिक संबंधों पर चर्चा हुई, द्विपक्षीय बैठकें हुईं, चीन ने भारत की ओर दोस्ती का नया हाथ बढ़ाया और रूस, मलेशिया और ईरान के नेताओं ने पीएम मोदी की तारीफ़ की..भारत की लीडरशिप में यह ग्रुप एक असरदार इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म के तौर पर उभरा है। चीन, रूस, ईरान, UAE, साउथ अफ्रीका और ब्राज़ील की भागीदारी इस ग्रुप की बढ़ती अहमियत को दिखाती है। ब्रिक्स समिट ऐतिहासिक रूप से सफल रहा है। भारत की लीडरशिप में चीन, रूस, ईरान, UAE, साउथ अफ्रीका और ब्राज़ील जैसे बड़े देशों ने एक वैकल्पिक और असरदार इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म बनाया है... पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा भी एक बहुत अहम घटनाक्रम है। प्रधानमंत्री मोदी की लीडरशिप में भारत की विदेश नीति बहुत सफल रही है।
ब्रिक्स की अब तक सबसे बड़ी कमजोरी उसकी आंतरिक विविधता और मतभेद रहे हैं। भारत और चीन के बीच सीमा एवं रणनीतिक अविश्वास की विरासत अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। रूस और पश्चिम के बीच संघर्ष, ईरान से जुड़े तनाव तथा पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियां भी ब्रिक्स के लिए साझा राजनीतिक रुख बनाना कठिन बनाती हैं। विशेष रूप से पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के अलग-अलग हित हैं। ऐसे में ब्रिक्स में हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एकमत हो पाना संभव नहीं था लेकिन पीएम मोदी ने जो काम बहुत कठिन माना जा रहा था, वह काम करके दुनिया काे दिखा दिया है कि मोदी है तो मुमकिन है।उन्होंने सभी देशों का भरोसा ही नहीं जीता है उनको एक तरह से आश्वस्त भी किया है कि विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जो सबको साथ लेकर सबके विकास की सोच सकता है और उसमें पूरा सहयोग भी कर सकता है।
पीएम मोदी व भारत के सामने इस सम्मेलन में सबसे कठिन था कूटनीतिक संतुलन को बनाए रखना। उसे चीन और रूस के साथ सहयोग भी बढ़ाना है, लेकिन अमेरिका और यूरोप सहित पश्चिमी देशों से अपने आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध भी बनाए रखने हैं। भारत का हित किसी एक के साथ खड़े होने में नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने में है। यही वजह है पीएम मोदी ने ब्रिक्स को पश्चिम का विरोधी या ‘पश्चिम के विकल्प’ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।गैर पश्चिमी सगंठन के रूप में प्रस्तुत किया।कहीं से यह नहीं लगने दिया कि ब्रिक्स पश्चिम के विरोध में है। मोदी जानते हैं कि ब्रिक्स को विरोध का मंच बनाया गया तो वह वैश्विक दक्षिण के विकास, शांति, तकनीकी समानता और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व का मंच नहीं बन सकेगा,उसका विश्व में ज्यादा महत्व नहीं होगा।
पीएम मोदी चाहते हैं कि ब्रिक्स दुनिया को बेहतर विकल्प दे-ऐसा विकल्प जिसमें आर्थिक सहयोग हो, तकनीकी साझेदारी हो, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा हो, आतंकवाद के विरुद्ध साझा प्रतिबद्धता हो, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा हो, पर्यावरणीय संतुलन हो और विकासशील देशों की वास्तविक भागीदारी हो। भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तभी सार्थक होगी, जब ब्रिक्स शक्ति-संघर्ष का नया अखाड़ा बनने के बजाय सहयोग का नया सेतु बने। पीएम मोदी ने ब्रिक्स को शक्ति संघर्ष का नया अखाड़ा नहीं बनने दिया, उसे सहयोग सेतु बनाने का काम किया और इसके लिए उनकी तारीफ विश्व में की जा रही है मानवता का भविष्य केवल हथियारों, अंतरिक्ष अभियानों या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति में नहीं, बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों के बीच विश्वास, सह-अस्तित्व और साझा विकास में सुरक्षित है।ब्रिक्स सम्मलेन के जरिए पीएम मोदी यही काम करने का प्रयास किया है। यह भारत की अध्यक्षता में हुए ब्रिक्स सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि है।
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