राजनीति में राजनीति में ऐसा बहुत कम होता है जब राज्य के प्रमुख यानी सत्तारूढ़ दल व विपक्ष के नेता एक हो जाते हैं,ऐसा तब होता है जब सत्तारूढ़ दल का कोई नेता दोनों के दुश्मन पर हमला शुरू करता है।तब विपक्ष के नेता भी किसी न किसी तरीके यह कहते हैं कि सत्तारूढ़ दल का नेता जो कह रहा है वह सही है।जब दुश्मन एक हो जाता है,टारगेट एक हो जाता है तो राज्य के कट्टर विरोधी राजनीतिक दल के नेता एक हो जाते हैं और दुश्मन पर एक के बाद एक हमला करते हैं,सब एक के बाद बाद गाेली चलाते रहते हैं।दोनों का साझा दुश्मन होता है प्रशासनिक अधिकारी।अधिकारी को कोई कितना भी समझाए कि आप जनता के सेवक हो, वह नहीं समझता है और जनप्रतिनिधि को कभी न कभी एहसास दिला देता है कि जनता के वोट से तुम चुने गए हो, जनता के सेवक होगे तुम हम तो शासन करने वाले हैं।अधिकारी का दुर्भाग्य रहता है जब सांसद बृजमोहन अग्रवाल जैसे लोगों से पंगा ले लेता है और बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेता बरसों से राजनीति कर रहे हैं, जनता के सेवक है उनको मालूम है कि ऐसे अधिकारियों को कैसे ठीक किया जा सकता है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने आईएएस अमित कटारिया के खिलाफ अभद्र,अपमानजनक,अवमाननापूर्ण व्यवहार करने पर विशेषाधिकार हनन प्रोटोकाल नियमों के उल्लंघन की शिकायत का नोटिस दिया।इस नोटिस पर लोकसभा सचिवालय ने राज्य शासन के मुख्य सचिव को पत्र भेजकर स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।राज्य शासन के रिपोर्ट भेजने के बाद विशेषाधिकार समिति में इसकी सुनवाई होगी,आईएसएस अमित कटारिया को बुलाया जाएगा। स्पष्ट करने को कहा जाएगा कि क्या हुआ, क्यों हुआ और कैसे हुआ।समिति कटािरया के तथ्यों से संतुष्ट नहीं होती है तो कार्मिक मंत्रालय को कार्रवाई के लिए कहेगी।सांसदों व अधिकारियों के बीच न बनने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी सांसद संतोष पांडेय ने आईएएस जयप्रकाश मौर्य की शिकायत की थी,मौर्य को समिति के सामने खड़े होकर सफाई देनी पड़ी थी, इससे पहले राज्यसभा सांसद नंद कुमार साय ने आईपीएस मुकेश गुप्ता व श्वेता सिन्हा के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की सूचना दी थी।
छत्तीसगढ़ में जनप्रतिनिधि व नौकरशाहों के बीच सम्मान की लड़ाई कई सालों से चली आ रही है। दोनों का अपना ईगो होता है, दोनों अपने को बड़ा मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि दूसरा उनसे सम्मान से पेश आए।छत्तीसगढ़ मे ब्यूरोक्रेट्स ही शासन चलाते हैं,वह मानते हैं कि विभाग चलाने का अधिकार उनको है,जबकि जनप्रतिनिधि मानते हैं कि जनता के हित में अधिकारियों से काम करने को कहना उनका अधिकार है।इसलिए काम करने के लिए सांसद व विधायक अधिकारी को कहते हैं। कई बार होता है कि नेता जैसा सम्मान चाहता है वैसा सम्मान बड़ा अधिकारी नहीं देता है तो नेता को बुरा लगता है कि मैं इतना बड़ा नेता, इतने बार का विधायक,इतने बार का सांसद और यह मेरा सम्मान नहीं करता है। अधिकारी भी खुद को कई बार कम नहीं समझते हैं जानते हैं कि सांसद,विधायक ज्यादा से ज्यादा क्या कर लेगा,तबादला करा देगा, शिकायत करेगा।यही वजह है कि यह लडाई बरसों से चली आ रही है और बरसों चलती रहेगी।
अब ब्यूरोक्रेट्स के खिलाफ बृजमोहन अग्रवाल ने शुरुआत कर दी है तो इस सिलसिले को सांसद विजय बघेल ने भिलाई नगर निगम के तत्कालीन आयुक्त राजीव कुमार पांडेय व भिलाई चरौदा नगरनिगम आयुक्त डीएस राजपूत के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष समक्ष विशेषाधिकार हनन की शिकायत दर्ज कराकर आगे बढ़ाया है।।सांसद बघेल का आरोप है कि अधिकारी फोन तक नहीं उठाते।इस मामले में भूपेश बघेल जनप्रतिनिधियों के साथ है और मौका मिला है तो कहा है कि छत्तीसगढ़ की कमान दिल्ली व नागपुर के हाथ में है। चुने हुए जनप्रतिनिधि के साथ इस तरह का व्यवहार संसदीय मर्यादा के खिलाफ है बल्कि उन मतदाताओं का भी अपमान है जिन्होंने उनको चुनकर भेजा है।मो.अकबर ने सांसदों व विधायकों के साथ अधिकारियों द्वारा अच्छे से पेश नहीं आने पर आपत्ति जताई है और कहा है कि जनप्रतिनिधियों के सम्मान उनके द्वारा मांगी गई जानकारी समय पर देने के लिए समय समय पर १७ आदेश जारी हुए हैं लेकिन उऩका पालन अधिकारी नहीं कर रहे हैं।
भूपेश बघेल,मो.अकबर के अलावा कई भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया में अमित कटारिया के कृत्य की निंदा की है और सांसद अग्रवाल के समर्थन में पोस्ट किया है।इससे भाजपा की अंदरूनी राजनीति में हलचल है। ऐसे में उपमुख्यमंत्री अरुण साव के लिए भी कुछ कहना जरूरी हो गया और उन्होंने कहा है कि राज्य में जनप्रतिनिधियों का पूरा सम्मान होना चाहिए।उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए।प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है और यह काम सभी को करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि व्यूरोक्रेटस को ठीक करने के लिए भाजपा या कांग्रेस किसी की भी सरकार रहती है कुछ नहीं करती है,बड़े अधिकारियों का तबादला सुधार के लिए होता रहता है।लेकिन कई अधिकारी होते हैं जो सुधरते नहीं है। उनका तबादला होता रहता है और वह अधिकारी ही बने रहते हैं।
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