दिल बहलाने को एकता का ख्याल अच्छा है

Posted On:- 2026-06-09




सुनील दास

राजनीति में भी दुनिया की तरह दिल में कुछ और जुबां पर कुछ होता है। आपस में दिल नहीं मिलता है लेकिन हाथ मिलाते रहना पड़ता है।चाहते हैं आपस में सब एक दूसरे का बुरा चाहते हैं लेकिन दिखावा करते हैं कि हमसे बड़ा आपका भला चाहने वाला कोई दूसरा नहीं है।इंडिया गठबंधन ऐसे ही राजनीतिक दलों का जमावड़ा है। ऐसा गठबंधन आज तक देश में नहीं हुआ है,इसका कोई संयोजक नहीं है. इसका कहीं पर कार्यालय नहीं है। इसका कोई लैटरपेड तक नहीं है। इसका कोई संगठन नहीं है और पदाधिकारी भी नहीं हैं लेकिन गठबंधन है और जब भी कांग्रेस चाहती है इसकी बैठक होती है और कांग्रेस नहीं चाहती है तो इसकी बैठक कई साल तक नहीं होती है।लोकसभा चुनाव के पहले यानी २०२४ के पहले इंडिया गठबंधन की बैठक हुई थी उसके बाद अब ९ जून को इंडिया गठबंधन की बैठक हुई है।

लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि २४ के बाद सीधा २६ में इंडिया गठबंधन की बैठक की जरूरत कांग्रेस को क्यों महसूस हुई। इसकी वजह यह है कि राज्यों के चुनाव होते रहते हैं तो सब विपक्षी दलों को अपने अपने राज्य में चुनाव जीतने की चिंता लगी रहती है,कांग्रेस खुद राज्यों में चुनाव जीतना व अपनी स्थिति मजबूत करने में लगी रहती है।जब राज्यों में चुनाव होता रहता है तो कांग्रेस को इंडिया गठबंधन की कोई जरूरत नहीं रहती है क्योंकि उसे भी अऩ्य विपक्षी दलों की तरह हर राज्य में अपने राजनीतिक हित की ज्यादा परवाह होती है। ऐसे में उसका राज्य के दलों से टकराव भी होता रहता है। जब कांग्रेस का राज्यों में दूसरे दलों से टकराव चल रहा हो तो इंडिया गठबंधन की बात कैसे कर सकती है।सवाल तो उठेगा ही कि यह कैसा गठबंधन है कि इसके दल चुनाव के वक्त राज्यों में आपस में लड़ते रहते हैं और जैसे ही लोकसभा चुनाव को दो तीन साल बचा रहता है तो फिर इनको ख्याल आता है कि हमको तो लोकसभा चुनाव में भाजपा और मोदी को हराना है इसके लिए हमें एकजुटता तो दिखानी चाहिए। इंडिया गठबंधन की बैठक महज विपक्षी दलों की एकजुटता का दिखावा करना है इसके अलावा इसमें जो कुछ कहा जाता है, उसका कोई खास मतलब नहीं है।

कांग्रेस २०१४ के बाद तीन लोकसभा चुनाव हार चुकी है और कई राज्यों के चुनाव हार चुकी है। इस दौरान वह हिमाचल, तेलंगाना, कर्नाटक व इस साल केरल में गठबंधन के साथ चुनाव जीतने में सफल रही है. चुनाव में जीत के हिसाब से देखा जाए तो सबसे ज्यादा चुनाव हारने वाली कांग्रेस है। इसके बाद राज्यों के दल में सपा यूपी चुनाव दो बार हार चुकी है,बिहार राजद दो चुनाव हार चुका है, महाराष्ट्र शिवसेना व एनसीपी पिछला चुनाव हारे है,दिल्ली में पिछला चुनाव आप हारी है, तमिलनाडु में पिछला चुनाव डीएमके हारी है और पं. बंगाल में ममता हारी है।इंडिया गठबंधन के राज्यों के जो प्रमुख दल है, वह अपने राज्यों में चुनाव हारने वाले हैं। तो इंडिया गठबंधन चुनाव हारे हुए विपक्षी राजनीतिक दलों को गठबंधन है। इनकी बैठक हारे हुए राजनीतिक दलों की बैठक है। हार से निराश नेताओं की बैठक है। सबका दुख एक ही है कि भाजपा व मोदी ने उनको हराते आ रहे है, वह भाजपा व मोदी को राज्य में हरा नहीं पा रहे हैं।

हारे हुए सारे राजनीतिक दल जब भी बैठक करते हैं तो यह सोचकर खुश हो जाते हैं कि भाजपा व मोदी को हराने के लिए एक गठबंधन तो है। इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि इस गठबंधन के होेने न होने से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता है वह जानती है कि गठबंधन के जितने राजनीतिक दल हैं, उन्होंने अपने शासन में किसी राज्य में क्या किया है। जनता जानती है कि इस गठबंधन के पास कोई वैकल्पिक एजेंडा नहीं है कि हम सत्ता में आएंगे तो मोदी सरकार से बेहतर क्या करेंगे।वह बैठक करते हैं उससे वह खुद भले ही दिखाने के लिए उत्साहित हो जाएं लेकिन जनता को इंडिया गठबंधन की बैठक से कोई उम्मीद न पहले रहती थी और न आज रहती है। वह जानती है कि इनकी बैठक गठबंधन की एकता को दिखाने के लिए है, ऐसी एकता को दिखाने के लिए जो हकीकत में है ही नहीं विपक्षी दलों के बीच।

बैठक में हुआ क्या,एसआईआर और वोट लूट के मुद्दे पर देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजने,पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री से इस्तीफा मांगा और देश की गंभीर आर्थिक स्थिति,बेराेजगारी,महंगाई,किसानों व जनसराेकारों से जुडे अन्य मुद्दो पर चर्चा के लिए केंद्र सरकार से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की।एसआईआर का मुद्दा तो बिहार व पं.बंगाल चुनाव के पहले व चुनाव में जोर शोर से उठाया गया लेकिन हुआ क्या जनता ने तो उनकी बात को गंभीरता से लिया नहीं, दोनों जगह इंडिया गंठबंधन के दल चुनाव हारे हैं,जनता की अदालत के अलावा सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी दलों की हार हुई है, इसके बाद एसआईआर कोई मुद्दा नहीं रह जाता है,लेकिन राहुल गांधी का यह प्रिय मुद्दा इसलिए इसे बनाए ऱखने का प्रयास किया जा रहा है। बाकी बेरोजगारी है, महंगाई और समस्याएं है,सरकार अपने स्तर पर देश व जनता की बेहतरी के लिए जो कुछ हो सकता है,कर रही है। इस दौरान विपक्ष की भूमिका तो आलोचना करने की रही है, लोगों को डराने की रही है। ऐसे में जनता पीएम मोदी व भाजपा से ज्यादा भराेसा राहुल गांधी,कांग्रेस व विपक्षी दलों पर कैसे कर सकती है। राहुल गांधी व विपक्षी दलों को समझने की जरूरत है कि महज गठबंधन की बैठक करने से जनता उस पर भरोसा नहीं करने वाली है।



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