ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किस एक्शन की तैयारी में हैं राहुल गांधी? कैसे हटाएं जा सकते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त

Posted On:- 2026-09-25




नई दिल्ली(वीएनएस)।कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। विपक्ष ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं, वहीं आयोग के भीतर भी फैसलों पर आपत्तियां सामने आई हैं। नियमों के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह कड़ी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है।
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाने जाएगा। कांग्रेस से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी दी। फिलहाल कानूनी के जानकारों से बात करके इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। इससे पहले बजट सत्र में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की कोशिश की थी। लेकिन उनके नोटिस को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के स्पीकर ने अस्वीकार कर दिया था। आपको बता दें कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखवीर संधू पिछले 10 महीने में 14 बार लिखित में चुनाव आयोग की गतिविधियों और फैसलों पर गंभीर असहमतियां जता चुके हैं। इसमें बंगाल चुनाव के दौरान ट्रिब्यूनल के सामने आयोग के द्वारा की गई अपील गोवा के जायज वोटरों को ना जोड़ पाना क्योंकि रोल बैक का ऑप्शन नहीं है सॉफ्टवेयर में। नए वोटर के लिए अनिवार्य फॉर्म सिक्स में जोड़ी गई नई शर्तें और सॉफ्टवेयर का दिल्ली से नियंत्रण और डाटा के सेंट्रलाइजेशन जैसे कई मसले हैं।  ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पहली कोशिश बंगाल चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने की थी। 12 मार्च को संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस जमा किए गए थे। लोकसभा वाले नोटिस पर 130 जबकि राज्यसभा वाले नोटिस पर 63 सांसदों ने दस्तखत किए थे। नियम के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के दस्तखत जरूरी हैं। यानी विपक्ष के पास संख्या बल पूरा था। विपक्ष का आरोप ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के बाद से चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता और संवैधानिक निष्ठा बनाए रखने में विफल रहा। मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूचियों के रखरखाव और देश भर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के विस्तार को लेकर भी आयोग के रवैया पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए। इन दोनों के बाद सदन में चर्चा हो सकती थी पर नहीं हो पाई और वजह इसकी 6 अप्रैल को राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने नोटिस खारिज कर दिया। उन्होंने अपने आदेश में लिखा कि विपक्ष की तरफ से लगाए गए आरोप पहली नजर में संविधान के अनुच्छेद 3245 और 124 के तहत कदाचार नहीं है। विपक्ष ने जिन बातों का जिक्र किया है उनमें से कुछ मामलों पर पहले ही फैसला हो चुका है या फिर वह अदालत में विचाराधीन है। लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला ने भी ऐसे ही तर्क देते हुए नोटिस अस्वीकार किया। यह तो पिछली बार की बात हुई है।  इस दफा क्या होगा? यह जानने के लिए पहले आप समझिए कि चुनाव आयोग की भर्ती और हटाने के नियम क्या है? 
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?
ECI (भारत निर्वाचन आयोग) पर देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी है। संविधान का अनुच्छेद 324 और 'CEC और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' CEC की नियुक्ति, कार्यकाल और उन्हें हटाने से जुड़े प्रावधान तय करते हैं। राष्ट्रपति, CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यों वाली एक सिलेक्शन कमिटी की सिफारिश पर करते हैं। इस कमिटी में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LoP) और केंद्रीय कैबिनेट का एक सदस्य शामिल होता है। 2023 के कानून के अनुसार, जिन लोगों को नियुक्त किया जाता है, उन्होंने पहले सरकार में सेक्रेटरी-लेवल के पदों पर काम किया हो और वे "ईमानदार व्यक्ति हों, जिन्हें चुनाव के मैनेजमेंट और संचालन का ज्ञान और अनुभव हो। ये नियुक्तियाँ छह साल के कार्यकाल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाती हैं। CEC को वही सेवाएँ और आर्थिक लाभ मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलते हैं। नएस्थान तलाशें
मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि CEC को पद से केवल "उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। यह बात 2023 के एक्ट की धारा 11(2) में भी कही गई है। आर्टिकल में आगे कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा। ECI को  राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए, CEC को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर बहुत मुश्किल रखा गया है। संविधान के आर्टिकल 124(4) के अनुसार, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, उन्हें केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। लत व्यवहार में कोई भी भ्रष्ट तरीका या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है। समय के साथ, अदालतों ने इसका मतलब ऐसे कामों से निकाला है जो CEC के पद के अनुकूल नहीं हैं, या CEC का अपने आधिकारिक कर्तव्यों को पूरा न कर पाना। अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति से है जिसमें अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ होता है। CEC को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सदनों के सदस्यों को गलत व्यवहार या अक्षमता का साफ़ आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव का नोटिस लाना होगा। महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं। वे प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए लोगों और जानकारी से सलाह ले सकते हैं। अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जाँच के लिए एक जाँच की जाती है। इसमें गलत व्यवहार या अक्षमता के सबूतों की जाँच करने के लिए एक समिति बनाना शामिल है। हटाने के प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों में से बहुमत का समर्थन मिलना चाहिए और संसद के दोनों सदनों में "मौजूद और वोट देने वाले" सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से इसे पास होना चाहिए। एक बार सफलतापूर्वक पास हो जाने पर, राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश देते हैं। एक बार संवैधानिक ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद कोई विवेकाधिकार नहीं रह जाता, क्योंकि इस मामले में राष्ट्रपति संसद की सलाह पर काम करते हैं।




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