कोई भी घटना होती है तो उसके कई पक्ष होते हैं और हर पक्ष का अपना सवाल होता है।सब को लगता है कि उसका सवाल सबसे ज्यादा गंभीर है,सबको लगता है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। सबको लगता है कि मेरे साथ गलत हुआ है। सही और गलत का फैसला तो जांच के बाद ही हो सकता है। जांच के बाद ही यह साफ हो सकता है कि घटना हुई तो गलती किसकी है। सही कौन है और गलत कौन है।सही गलत का फैसला होने के पहले ही एक दूसरे को गलत मान लेना ठीक नहीं है। आईटीआई मुंबई की घटना के बाद से हो यही रहा है कि जांच हुई नहीं है,जितने पक्ष हैं सब एक दूसरे को गलत ठहरा रहे हैं।कुछ छात्र शिक्षक को गलत ठहरा रहे हैं, छात्र के माता पिता भी शिक्षक को गलत मान रहे हैं।संस्थान के शिक्षक शिक्षक को सही मान रहे हैं। छात्रों की मांग पर छात्र आत्महत्या के बाद संस्थाऩ ने भी जांच के पहले शिक्षक को डीन के पद से हटा दिया है। यानी क्रिया का प्रतिक्रिया होती गई और मामला उलझता चला गया है। संस्थान का मामला है तो इसे संस्थान को निपटाने देना चाहिए लेकिन हमारे देश में कोई मामला एससी,एसटी का होता है तो राजनीतिक दलों को राजनीति करना जरूरी हो जाता है।
आईटीआई मुंबई में एक शिक्षक ने एक छात्र को परीक्षा में नकल करते हुए।इस घटना के बाद छात्र ने अपने कमरे में जाकर खुदकुशी कर ली।छात्रों ने मान लिया कि छात्र ने खुदकुशी शिक्षक के व्यवहार कारण की और उन्होंने संस्थान में शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया।छात्र के माता पिता ने शिक्षक के खिलाफ एससी,एसटी एक्ट में मामला भी दर्ज करा दिया।संस्थान ने शिक्षक को डीन के पद से हटा दिया।छात्रों की मांगें भी मान ली। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी विद्यार्थी को नकल करते पकड़ना गलत है? इस प्रश्न का जवाब है नहीं। परीक्षा में नकल रोकना शिक्षक की जिम्मेदारी है। यदि किसी विद्यार्थी के पास परीक्षा के दौरान अनुचित साधन पाए जाते हैं, तो संस्थान की निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाती है।मामला एक संस्थान का था तो यहां पर पूरे मामले को सावधानी के हैंडल करने की जिम्मेदारी संस्थान की थी।उससे चूक यह हुई कि जिस विद्यार्थी की मृत्यु हो चुकी है, उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उसके खिलाफ अनुशासनात्मक आरोप सार्वजनिक करना अनुचित था। बाद में आईआईटी-बंबई ने स्वयं अपनी पूर्व सूचना पर खेद जताते हुए कहा कि घटना से जुड़े तथ्य अभी जांच के अधीन हैं और जांच पूरी होने से पहले घटनाक्रम को इस तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं था।
यहीं से सभी पक्ष को सवाल उठाने का मौका मिल गया और सबने सवाल उठाया भी।शिक्षक का पक्ष है कि क्या किसी विद्यार्थी को नकल करते पकड़ना गलत है? इस प्रश्न का जवाब है नहीं। परीक्षा में नकल रोकना शिक्षक की जिम्मेदारी है। यदि किसी विद्यार्थी के पास परीक्षा के दौरान अनुचित साधन पाए जाते हैं, तो संस्थान की निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होना स्वाभाविक है। छात्र आत्महत्या के बाद छात्रों के प्रतिनिधियों ने भी स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन नकल का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था और जांच प्रक्रिया को लेकर है। लेकिन नकल पकड़ना और नकल का आरोप सिद्ध हो जाना दो अलग बातें हैं। किसी शिक्षक को परीक्षा में अनुचित साधन रोकने का अधिकार है, लेकिन किसी आरोप को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करना अलग प्रश्न है।
साहिल के माता-पिता की शिकायत के आधार पर दर्ज प्राथमिकी में प्रोफेसर डूला पर जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर, आईआईटी-बंबई के शिक्षक मंच के अध्यक्ष राजकुमार पंत का दावा है कि संस्थान के अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ के पास साहिल की ओर से पिछले तीन-चार महीनों में ऐसी कोई शिकायत दर्ज होने का रिकॉर्ड नहीं है। शिक्षक मंच ने डूला के समर्थन में कहा है कि उन्होंने संस्थान की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपना कर्तव्य निभाया।यहीं से अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के इस्तेमाल को लेकर बड़ी बहस खड़ी होती है। देखा जाये तो अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून का उद्देश्य जातिगत अपमान और अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति को प्रभावी कानूनी सुरक्षा देना है। लेकिन इसी के साथ एक असहज सवाल भी लगातार उठता रहा है कि क्या कुछ मामलों में इस कठोर कानून का इस्तेमाल वास्तविक अत्याचार की बजाय व्यक्तिगत विवाद, संस्थागत संघर्ष या दबाव बनाने के साधन के रूप में किया जाता रहा है।ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छात्र के माता पिता ने गुस्से में शिक्षक के खिलाफ मामला दर्ज करा दिया है।
अब जब मामला बहुपक्षीय है तो हर शिकायत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होनी चाहिए। मामला चाहे शिक्षक-छात्र का हो, नौकरी का हो, विश्वविद्यालय का हो या निजी विवाद का, पहले आरोप, फिर जांच और उसके बाद निष्कर्ष, यही न्याय का रास्ता है। कानून पीड़ित को सुरक्षा दे, लेकिन किसी निर्दोष को बिना जांच सामाजिक और कानूनी सजा देने का माध्यम नहीं बने। इस मामले में भी आरोपों की जांच बाकी है। न शिक्षक को जांच से पहले दोषी घोषित किया जा सकता है, न विद्यार्थी के खिलाफ लगाए गए अनुशासनात्मक आरोपों को जांच के बिना अंतिम सत्य माना जा सकता है।आईआईटी जैसे संस्थानों की असली परीक्षा केवल कठिन परीक्षा लेने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में न्यायपूर्ण व्यवस्था कायम रखने में है। सब चाहते हैं कि नकल रोकिए, कठोरता से रोकिए। परीक्षा की शुचिता से कोई समझौता मत कीजिए। लेकिन आरोप को जांच से पहले फैसला मत बनाइए।
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