गगनयान उड़ान पूर्व के सुरक्षा परीक्षण हुए सफल

Posted On:- 2026-07-13




प्रमोद भार्गव

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने अभियान गगनयान अभियान की सुरक्षा और सफलता सुनिषचत करने की दृश्टि से किए गए क्रू माॅड्यूल प्रणाली के तीन परीक्षण सफलता के साथ संपन्न हो गए। ये परीक्षण अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी, आपात स्थिति में माॅड्यूल को सीधा रखने और पैराषूट की मजबूती परखने से संबंधित है। क्रू माॅड्यूल अंतरिक्ष यान का वह कक्ष होता है, जिसमें बैठकर अंतरिक्ष यात्री उड़ान भरते है। यह अंतरिक्ष के कठोर वातावरण में यात्रियों के रहने के लिए तैयार किया गया एक वातानुकुलित मजबूत कैप्सूल होता है, जो यात्रियों को विकीरण और अधिकतम तापमान के दुश्प्रभावों से बचाता है। ये सभी परीक्षण मध्यप्रदेष के ष्योपुर जिले की हरितभूमि से जुलाई-2026 में किए गए।  

देष के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम गगनयान से जुड़े पैलोड के साथ उड़ान भरने वाले परीक्षण यान के असफल होने की स्थिति में क्रू माॅड्यूल अर्थात जिसमें अंतरिक्ष यात्री सवार होंगे को बाहरी अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने के बाद वापस सुरक्षित लाने के लिए क्रू एस्केप सिस्टम यानी चालक दल बचाव प्रणाली (सीईएस) का सफल परीक्षण कर विष्व कीर्तिमान रच दिया है। इस बचाव प्रणाली की जरूरत इसलिए थी, क्योंकि यान के असफल होने पर कई वैज्ञानिक प्राण गंवा चुके हैं। हालांकि ये परीक्षण समुद्र के ऊपर आसमान में किए जाते हैं, ऐसे परीक्षणों में क्रू माॅड्यूल को राॅकेट से छोड़ा जाता है और फिर इसे राॅकेट से अलग कर समुद्र में गिरा दिया जाता है। भारत यह परीक्षण पहले ही कर चुका है। इसके विपरीत ष्योपुर में किए गए परीक्षण के अंतर्गत अम्बिलिकल मैकेनिज्म अलगाव प्रणाली के द्वारा अंतरिक्ष यात्रियों वाले क्रू माॅड्यूल और इसे ऊर्जा देने वाले सर्विस माॅड्यूल जो आपस में जुड़े होते हैं, इन्हें आसमान में छोड़ा जाता है। फिर वायुमंडल में प्रवेष से ठीक पहले इन दोनों हिस्सों को बिना किसी बाधा के अलग करने की प्रक्रिया का परीक्षण किया जाता है। इसके तहत क्रू माॅड्यूल से जुड़े पैराषूट के डिब्बे को सुरक्षित रखने वाले ढक्कन (एपेक्स कवर) को अलग किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान क्रू माॅड्यूल की उस क्षमता को परखा गया जो उड़ान के समय पड़ने वाले दबाव के 1.75 अधिक होती है। इस जांच का लक्ष्य अधिकतम संभावित वजन की स्थिति में पैराशूट की तकनीकी क्षमता और मजबूती को परखना होता है। इस परीक्षण में इसरो का सब-ऑर्बिट लॉन्च व्हीकल फॉर एक्सपेरिमेंट अभियान खरा साबित हुआ। इस परीक्षण से पहले जून 2026 में गगनयान के अंतरिक्ष में ले जाने वाले रॉकेट के इंजन (एलवीएम-3) का 90 प्रतिशत थ्रस्ट भार परीक्षण भी जांच कर लिया गया है। इन परीक्षणों का मुख्य उद्देष्य कालांतर में मानव रहित गगनयान-जी-1 और अंतिम मानवयुक्त मिषन के लिए तकनीकी खामियों की संभावना को षून्य करना रहा है। 2027 मानवयुक्त गगनयान अंतरिक्ष में छोड़ा जा सकता है। इसके बाद 2035 में भारत अंतरिक्ष स्टेषन स्थापित करने का इच्छुक है और फिर 2040 में चंद्रमा पर भारतीय नागरिकों को उतारने की कल्पना की जा रही है।

मानव युक्त गगनयान को छोड़ने से पहले भारत मानवरहित गगनयान छोड़कर वास्तविक उड़ान की सभी तकनीकों को परखेगा, जिससे किसी भी हादसे की आषंका दूर बनी रहे। इस यात्रा में हाफ ह्मूमनाॅइड रोबोट ‘व्योममित्र‘ को भेजा जाएगा। यह एक ऐसा रोबोट होता है, जो षारीरिक संरचना में इंसानों जैसा अनुभव होता है। इसे ‘रोबोट-मानव‘ कहते है। यह रोबोट महिला के रूप में यात्रा करेगी। इस व्योमित्र को वैज्ञानिक क्रू माॅड्यूल की प्रणाली में जोड़ने का काम फिलहाल कर रहे हैं। व्योमित्र अंतरिक्ष में मानवीय गतिविधियों की नकल करेगी और जीवन-सुरक्षा प्रणाली को परखेगी। साथ ही कक्ष पर वायुमंडल के पड़ने वाले दबाव पर भी नजर रखेगी। यह अभियान गगनयान की धरती पर वापसी और समुद्र में लैंडिग की प्रक्रिया का डेटा जुटाएगा। जिससे, मानवयुक्त अंतरिक्ष मिषन को षत-प्रतिषत सुरक्षित बनाया जा सके। हालांकि इसके बाद मानव रहित जी-2 और जी-3 मिषनों के द्वारा भी नए परीक्षण किए जा सकते हैं।

इस मिषन के लिए 10 हजार करोड़ रुपए मंजूर किए जा चुके हैं। अब तक भारतीय या भारतीय मूल के चार वैज्ञानिक अंतरिक्ष की यात्रा कर चुके हैं। राकेश शर्मा अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय हैं। शर्मा रूस के अंतरिक्ष यान सोयुज टी-11 से अंतरिक्ष गए थे। इनके अलावा भारतीय मूल की कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स भी अमेरिकी कार्यक्रम के तहत अंतरिक्ष जा चुकी हैं। 2025 में शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष की यात्रा की थी। शुक्ला  ने अंतरिक्ष में बीज बोने का अनूठा कार्य किया था। ये सावधानियां इसलिए बरती जा रही हैं, क्योंकि अमेरिकी मानव मिशन की असफलता के चलते भारतीय महिला वैज्ञानिक कल्पना चावला की मृत्यु हो गई थी। वे कोलंबिया अंतरिक्ष यान आपदा में मारे गए 7 यात्री दल सदस्यों में से एक थीं। इसी दृष्टि से अंतरिक्ष यात्री सुरक्षा-प्रणाली इसरो ने विकसित की है। मानवरहित यान अपना लक्ष्य साध लेता है तो 2027 में रोबोट मानव के साथ गगनयान भेजने की तैयारी में भारत है। अब तक अमेरिका, रूस और चीन ने ही अंतरिक्ष में अपने मानवयुक्त यान भेजने में सफलता पाई है। रूस ने 12 अप्रैल 1961 को रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गागरिन को अंतरिक्ष में भेजा था। गागरिन दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री थे। अमेरिका ने 5 मई 1961 को एलन शेपर्ड को अंतरिक्ष में भेजा था। ये अमेरिका से भेजे गए पहले अंतरिक्ष यात्री थे। चीन ने 15 अक्टूबर 2013 को यांग लिवेई को अंतरिक्ष में भेजने की कामयाबी हासिल की थी। गोया, भारत ने अब अंतरिक्ष में बड़ी छलांग लगाने की पुख्ता तैयारी कर ली है। मानवयुक्त गगनयान में अंतरिक्ष यात्री लगभग 3 से 7 दिन बिताते हुए सूक्षम गुरुत्वाकर्शण के प्रभावों से जुड़े अनेक वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे। इस ऐतिहासिक यात्रा में जाने वाले यात्रियों के नाम भी तय हो गए हैं। ये हैं, प्रशांत बालकृष्णन  , अजीत कृष्णन, अंगद प्रताप और विंग कमांडर शुभांशु  शुक्ला हैं। वर्तमान में उन्हें अंतरिक्ष यात्रा का गंभीर परीक्षण दिया जा रहा है।  

बहरहाल अंतरिक्ष में भारतीय मानव मिषन के सफल होने के बाद ही चंद्रमा और मंगल पर मानव भेजने का रास्ता खुलेगा। इन पर बस्तियां बसाए जाने की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी। आने वाले वर्शों में अंतरिक्ष पर्यटन के भी बढ़ने की उम्मीद है। इसरो की यह सफलता अंतरिक्ष पर्यटन की पृश्ठभूमि का एक हिस्सा है। यह अभियान देष में अंतरिक्ष षोधकार्यों को बढ़ावा देगा। साथ ही भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई प्रोद्यौगिकी तैयार करने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों का तो यहां तक दावा है कि दवा, कृषि, औद्योगिक सुरक्षा, प्रदूषण, कचरा प्रबंधन तथा पानी एवं खाद्य स्रोत प्रबंधन के क्षेत्र में भी तरक्की के नए मार्ग खुलेंगे।   



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