शुवेंदु सरकार ने पं.बंगाल में 65 मुस्लिम उपसमूहों को ओबीसी आरक्षण सूची से बाहर का रास्ता दिखाया

Posted On:- 2026-06-30




कोलकाता(वीएनएस)।विधानसभा में पारित किए गए दोनों विधेयकों में पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग को फिर से अधिक अधिकार दिए गए हैं। साथ ही तृणमूल कांग्रेस सरकार के समय तैयार की गई अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों की सूची को कानूनी मान्यता देने वाले प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार को अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण व्यवस्था से जुड़े दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को पारित कर राज्य की आरक्षण नीति में बड़ा बदलाव कर दिया। इन संशोधनों के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणी से बाहर की 66 समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया है। इनमें 54 हिंदू और 12 मुस्लिम समुदाय शामिल हैं। राज्य सरकार का दावा है कि यह कदम आरक्षण व्यवस्था को कानूनी रूप से मजबूत और अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

विधानसभा में पारित किए गए दोनों विधेयकों में पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग को फिर से अधिक अधिकार दिए गए हैं। साथ ही तृणमूल कांग्रेस सरकार के समय तैयार की गई अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों की सूची को कानूनी मान्यता देने वाले प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। राज्य के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरिशंकर घोष ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग संशोधन विधेयक 2026 तथा पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग संशोधन विधेयक 2026 को सदन में पेश किया। बहस और मत विभाजन के बाद दोनों विधेयक पारित हो गए।

इन संशोधनों के माध्यम से वर्ष 2012 में तृणमूल कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए बदलावों को वापस लेने की कोशिश की गई है। भारतीय जनता पार्टी लगातार आरोप लगाती रही है कि पिछली सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ मुस्लिम समुदायों को असंतुलित तरीके से दिया, जबकि कई सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हिंदू समुदायों की अनदेखी की गई। नई व्यवस्था में मुस्लिम समुदायों की संख्या को काफी घटाया गया है। पहले की तृणमूल सरकार द्वारा तय ढांचे में 65 मुस्लिम उपसमूह शामिल थे, जबकि अब केवल 12 मुस्लिम समुदाय ही सूची में रखे गए हैं। इसी तरह हिंदू उपसमूहों की संख्या में भी बदलाव किया गया है।

दरअसल, तृणमूल सरकार ने पहले अन्य पिछड़ा वर्ग सूची को बढ़ाकर 113 उपसमूह कर दिया था, जिनमें 77 मुस्लिम और 36 हिंदू समुदाय शामिल थे। बाद में इसे बढ़ाकर 140 उपसमूह कर दिया गया, जिनमें 77 मुस्लिम और 63 हिंदू समुदाय शामिल थे। इस व्यवस्था को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। वर्ष 2025 में उच्च न्यायालय ने इस सूची को रद्द कर दिया और कहा कि समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने की प्रक्रिया कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं थी। अदालत ने यह भी कहा था कि राज्य सरकार ने आयोग की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। बाद में उच्चतम न्यायालय ने कुछ मामलों में रोक हटाई, लेकिन अब नई सरकार ने व्यवस्था को फिर से पुराने 66 समुदायों वाले ढांचे पर ला दिया है।

हम आपको याद दिला दें कि मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने वर्ष 2010 के बाद जारी सभी अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था। अदालत का मानना था कि समुदायों को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया में गंभीर कानूनी कमियां थीं। इसके बाद इस साल मई में सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अधिसूचना जारी कर अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को पहले के 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया था। यह आरक्षण राज्य की 66 अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों तक सीमित कर दिया गया। गर्भावस्थाऔर मातृत्व

नए संशोधनों के अनुसार राज्य सरकार पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श करके अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का प्रतिशत तय करेगी और समय समय पर उसमें बदलाव भी कर सकेगी। हालांकि कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। सरकार को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़ेपन की मात्रा के अनुसार समुदायों को अलग-अलग श्रेणियों में बांट सके।

हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1993 में किए गए संशोधन के तहत अब कोई भी व्यक्ति किसी समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने या किसी समुदाय को जरूरत से ज्यादा अथवा कम प्रतिनिधित्व देने के खिलाफ आपत्ति दर्ज करा सकेगा। ऐसे मामलों में आयोग की सिफारिशें राज्य सरकार पर बाध्यकारी होंगी। मंत्री गौरिशंकर घोष ने कहा कि अब आयोग समुदायों की वास्तविक स्थिति की जांच करेगा और यदि किसी समुदाय को शामिल करने की जरूरत महसूस होगी तो वह सरकार को सिफारिश भेजेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने आयोग को दरकिनार करके मनमाने तरीके से समुदायों को सूची में शामिल किया था, जिसके कारण अदालत ने पूरी प्रक्रिया को खारिज कर दिया।हम आपको बता दें कि संशोधित  कानून के तहत आयोग के सदस्यों का कार्यकाल पहले की तरह तीन वर्ष रहेगा, लेकिन सदस्य सचिव का कार्यकाल राज्य सरकार तय करेगी। सदस्य सचिव एक कार्यरत सरकारी अधिकारी होगा।

हम आपको याद दिला दें कि पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण की शुरुआत वाम मोर्चा सरकार के समय रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के बाद हुई थी। पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण को श्रेणी ए और श्रेणी बी में बांटा गया था। श्रेणी ए के लिए 10 प्रतिशत और श्रेणी बी के लिए 7 प्रतिशत आरक्षण तय किया गया था। वर्ष 2010 में तत्कालीन मंत्री जोगेश चंद्र बर्मन ने इस संबंध में विधेयक पेश किया था। बाद में तृणमूल कांग्रेस सरकार ने 2012 में इस कानून में संशोधन कर श्रेणी ए और श्रेणी बी के तहत समुदायों की संख्या बढ़ा दी थी। इसमें अनुसूचित जाति से धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने लोगों को भी श्रेणी बी में शामिल किया गया था। अब शुभेन्दु अधिकारी की सरकार ने पूरी व्यवस्था को फिर से पुनर्गठित करते हुए आयोग आधारित प्रक्रिया को अनिवार्य बना दिया है।



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