डर भी बढ़ता है और सवाल भी उठता है

Posted On:- 2026-05-19




किसी राज्य या किसी शहर में कानून व्यवस्था का सवाल तब तो उठता ही है जब आम लोगों के साथ आए दिन लूट या छिनताई की घटना हो जाए लेकिन कानून व्यवस्था पर सवाल तब जोर शोर से उठता है कि जब किसी वीआईपी से लूट का छिनताई हो जाए। वीआईपी से लूट या छिनताई बड़ी घटना होती है और आम लोगों से लूट का छिनताई छोटी घटना होती है। पुलिस और विपक्ष के लिए तो लूट या छिनताई तो एक समान घटना होनी चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है क्योंकि वीआईपी वीआईपी होता है और आम आदमी आम आदमी होता है। वीआईपी का महंगा मोबाइल कोई छीन ले तो वह बड़ी घटना होती है, विपक्ष उसे सरकार के मुंह पर कराया तमाचा समझता है और आम आदमी का मोबाइल आए दिन कोई छीन लेता है,लूट लेता है तो यह किसी के मुंह पर तमाचा नहीं होता है।यह तो रोज होने वाली घटना होती है।

रोज होने वाली घटना को न तो पुलिस गंभीरता से लेती है और न ही राज्य का विपक्ष गंभीरता से लेता है क्योंकि दोनों मान के चलते हैं कि रोज होने वाली घटना तो रोज होती रहती है, उसे रोका नहीं जा सकता।सच भी है पुलिस कैसे लूट या छिनताई को रोक सकती है। यह तो अचानक कहीं भी,किसी के साथ भी,कोई भी कर सकता है। आम आदमी जा रहा है अचानक कोई बाइक पर आएगा और उसके हाथ से मोबाइल छीन कर भाग जाएगा तो कोई क्या कर सकता है।आम आदमी को तो रोज ऐसे लोगों से पाला पड़ता है। कोई शराब पीने के लिए पैसा मांगता है, नहीं देने पर छीन लेता है,कोई महंगा मोबाइल देखता है तो उसे पसंद आ जाता है तो छीन लेता है।आम आदमी इस तरह की घटना उसके साथ हो या किसी दूसरे के साथ हो वह डर जाता है। वह जानता है कि यह एक बार हुआ तो दूसरी बार भी हो सकता है। कोई उसे कितना भी कहे कि उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस है तो उसे भरोसा नहीं होता कि पुलिस उसे लूट या छिनताई से बचा सकती है।

जिसे लूटना है या किसी का मंहगा मोबाइल छीन कर भाग जाना है। वह तो मौका मिलते ही ऐसा करता है।जब उसको मौका मिलता है वह करता है।करते वक्त वह यह नहीं देखता है कि उसका शिकार आम आदमी है या वीआईपी है।आम आदमी का मोबाइल सस्ता हो महंगा हो, वह एक बार कोई लूट लेता है या छीन लेता है तो आम आदमी को भरोसा नहीं होता है कि पुलिस उसे तलाश कर कुछ दिनों में वापस करेगी।पुलिस को मोबाइल वापस करना भी होता है तो वह एक साथ सौ दो सौ मोबाइल जब तलाश लेती है तो एक साथ वापस करती है क्योंकि तब पुलिस को भी लगता है कि उसने कोई बड़ा काम किया है और आम लोगों को भी लगता है कि पुलिस ने कितना बड़ा काम किया है, महीनों बाद सही उसका मोबाइल वापस तो किया।आम आदमी के मोबाइल को ढूंढने की पुलिस को कोई जल्दी नहीं होती है लेकिन वीआईपी मामले में पुलिस को जल्दी होती है इसलिए वह वीआईपी का मोबाइल घंटो में तलाश कर ही लेती है।

प्रदेश के वरिष्ट राजनेता व विधायक धरमलाल कौशिक को थोड़ी न पता था कि उनका भी मोबाइल कोई लूट सकता है या छीन सकता है वह तो मानकर घर से निकले थे कि अब तो राजधानी में कमिश्नर प्रणाली लागू हो गई है, उनसे कोई कैसे मोबाइल सुबह सैर के समय छीन सकता है और उनका मोबाइल कोई छीनकर भाग गया। होता है ऐसा सभी बड़े नेताओं के साथ होता है वह मानते कुछ है और  हकीकत कुछ और होता है। इसीलिए तो सुशासन तिहार मनाया जा रहा है कि जमीनी हकीकत का पता रहे।

वरिष्ठ भाजपा नेता से मोबाइल छीन लेने की घटना पर हंगामा तो होना ही था क्योंकि देश के गृहमंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ आए हुए हैं,राजधानी में हाई अलर्ट है और हाई अलर्ट में कौशिक का मोबाइल छीन जाना वाकई में बड़ी घटना तो है। बडी़ घटना की बड़ी प्रतिक्रिया हुई और जांच के लिए,आरोपी को पकड़ने के लिए दो डीसीपी,दो एडीसीपी और तीन एसीपी समेत बडी़ संख्या में पुलिस निकल पड़ी उसको पकड़ने और मामला वीआईपी को होने के कारण आठ घंटे के भीतर उसे पकड़ भी लिया गया।इससे राज्य की जनता को यह पता चल गया कि हमारे यहां की पुलिस कितनी तेजी से काम करती है जब मामला वीआईपी का हो और यह भी साफ हो गया कि मामला आम आदमी को हो तो पुलिस इसी तरह के मामले में देरी करती है तो क्यों करती है। ऐसे में वीआईपी लोग क्यों नहीं मानेंगे कि राजधानी में कानून व्यवस्था ठीक है और आम आदमी क्यों कहता है कि पुलिस है हमारी सुरक्षा के लिए हैं लेकिन हमको उस पर भराेसा नहीं है या भरोसा कम होता जा रहा है।यह सुनने में अच्छा लगता है कि पुलिस व कानून सबके लिए बराबर है लेकिन ऐसा दिखता कहां है।



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