यह सच है कि राजनीति में आरोपों का बड़ा महत्व होता है। राजनीति में रोज एक राजनीतिक दल के नेता विरोधी दल व उसके नेताओं पर आरोप लगाते रहते हैं। बदले में विरोधी भी आरोप लगाते हैं और राजनीति मे आरोपों की लड़ाई चलती रहती है और ऐसा लगता है कि राजनीति के लोग कुछ कर रहे हैं।राजनीति में प्रतिस्पर्धा चलती रहती है कि तुम्हारी कमीज से मेरी कमीज ज्यादा सफेद है।दाग ज्यादातर राजनीतिक दलों के दामन में लगे रहते हैं लेकिन कोई अपने दामन के दाग नहीं देखता है, वह दूसरे के दामन को दागदार बताता है और वहम मे जीता है कि जनता उसको ज्यादा अच्छा राजनीतिक दल या नेता मानेगी और दूसरे को नकार देगी। राजनीतिक दलों के नेताओं को आरोप लगाने की आदत रहती है और वह इस आदत के कारण कभी कभी राजनीति के बाहर आरोप लगाते हैं उनको मुंह की खानी पड़ती है।
आप के संयोजक केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा पर आदत से मजबूर होकर आरोप लगा दिया कि वह आरएसएस के कार्यक्रमों में जाती हैं,उनके बच्चे सरकारी पैनल में वकील हैं।इसलिए वह उनके मामले में निष्पक्ष न्याय नहीं कर सकती। उऩकी मांग थी उनके लगाए आरोपों के कारण न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा को उनके मामले से हट जाना चाहिय। उनको आशंका है कि वह उनके मामले में निष्पक्ष न्याय नहीं कर सकती। निचली अदालत से केजरीवाल को बरी कर दिए जाने पर सीबीआई ने ऊंची अदालत मे अपील की और पहली सुनवाई में ही अदालत ने साफ कर दिया कि निचली अदालत ने जो फैसला दिया है, वह ठीक नहीं है और वह इसकी सुनवाई करेगी।
न्यायमूर्ति शर्मा ने कई मामलों में केजरीवाल के खिलाफ फैसला दिया है, इसलिए केजरीवाल का मामला उनकी अदालत में गया तो केजरीवाल को लगा कि हमेशा की तरह उनके मामले में फैसला उनके खिलाफ ही आएगा। इसलिए उन्होंने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा को उनके मामले से हटने की मांग की थी और याचिका दायर की थी।माना जाता है कि याची को अधिकार होता है कि वह जज बदलने की मांग करे और उसका कोई ठाेस आधार बताये। केजरीवाल को भी अधिकार था लेकिन वह जज को उनके मामले से हटने के लिए कोई ठोस आधार पेश नहीं कर सके महज उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, उन आरोपों के आधार पर जज को उनके मामले हट जाना चाहिए ऐसा वह चाहते थे। अगर ऐसा हो जाता तो एक गलत परंपरा होती क्योंकि फिर कोई भी जज पर आरोप लगाता औ चाहता कि जज को उसके मामले को नहीं देखना चाहिए। यानी न्याय के लिए हर कोई फिर अपनी पसंद का जज चुनने लगता।
इसी आधार पर न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने केजरीवाल की मांग पर हटने से इंकार कर दिया और केजरीवाल की जज को हटाने वाली याचिका का खारिज कर दिया। जस्टिश शर्मा ने दो टूक कहा कि वह केजरीवाल के मामले से अपने को अलग नही करेंगी।उनका कहना है कि नेता या वादी किसी जज की न्यायिक क्षमता को तय नहीं कर सकता। न ही वादी यह तय कर सकता है कि अदालत कैसे चले,न ही निराधार आरोपों पर जजों का चयन किया जा सकता है।जस्टिस शर्मा का कहना है कि जज का किसी मामले की सुनवाई से हटना कानून से तय होना चाहिए किसी नैरिटिव से नहीं होना चाहिए।उन्होंने कहा है कि व्यक्तिगत आरोपों या सोशल मीडिया के दबाव के कारण जज का हटना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए घातक है।जजों की क्षमता उच्चअदालते तय करती हैं, पक्षकार नहींं।
उनका यह कहना सही है कि वह चाहती तो चुपचाप हट जाना उनके लिए अन्य जजों की तरह आसान रास्ता होता।पर जब जज की प्रतिष्ठा पर झूठे आरोप लगाकर रोज हमला किया जाए तो जज को न्याय व्यवस्था की बेहतरी के लिए जवाब देना ही होता है। अपनी ड्यूटी करनी होती है।उन्होंने अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में जाने के विषय में कहा कि ये कार्यक्रम राजनीतिक नहीं कानूनी थे।जजों व वकीलों के बीच कोर्ट के बाहर भी रिश्ता होता है।केजरीवाल ने आरएसएस के कार्यक्रम के बारे में बताया यह नहीं बताया मैं और कौन कौन से कार्यक्रम में गई थी। केजरीवाल की चयनात्मक शैली से उनकी मंशा का पता चलता है। बच्चे सरकारी पैनल हैं इस पर जस्टिस शर्मा का कहना था कि सिर्फ इसी आधार पर जज की न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाया नहीं जा सकता।नेताओं के बच्चे राजनीति में आते है, जजों के बच्चे वकालत करें तो उस पर कैसे सवाल उठाया जा सकता है।
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