गलती हो जाए तो उसे मान लेना ही ठीक रहता है

Posted On:- 2026-10-16




सुनील दास









आदमी से गलती हो सकती है, किसी भी क्षेत्र में आदमी से कोई गलती हो जाए तो उसे जल्दी मान लेना ही ठीक रहता है। इससे ऐसा लगता है कि गलती हो गई तो गलती करने वाले को गलती होने का एहसास है,वह नहीं चाहता था ऐसा करना लेकिन उससे ऐसा हो गया।राजनीतिक दलों के नेता भी आदमी होते हैं,कई बार उनसे भी गलत निर्णय हो जाते हैं। निर्णय करते वक्त उनको लगता है कि वह कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं लेकिन जब उस काम की चौतरफा आलोचना होती है तो उनको एहसास होता है कि उनसे गलती हो गई है,वह जिसे सही फैसला समझ रहे थे,वह तो अब गलत माना जा रहा है।राहुल गांधी व कांग्रेस के नेताओं से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने की गलती तो हुई है,लेकिन कांग्रेस व राहुल गांधी ने उसे अब तक न तो गलत माना है और न ही उसके लिए माफी मांगी है।
राहुल गांधी ही कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं,उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह कोई गंभीर फैसला करते हैं तो अपने पद परिवार की गरिमा का ख्याल रखते हुए करें। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से सलाह मश्वरा कर करें ताकि कोई ऐसी गंभीर गलती न हो जाए जिसके लिए उनको कांग्रेस के इतिहास में याद किया जाए कि कांग्रेस में राहुल गांधी ही ऐसे नेता हुए थे, जिनसे ऐसी गलती हुई थी,जैसी गलती किसी कांग्रेस नेता से नहीं हुई थी। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे व राहुल गांधी से पहली गलती तो यह हुई कि उन्होंने सीजेआई से उन मसलों पर चर्चा के लिए मुलाकात का समय मांगा,जो अदालत में लंबित हैं।ऐसे मामले सीजेआई उनसे कैसे मिल कर उन मुद्दों पर चर्चा कर सकते थे,इसलिए सीजेआई ने मिलने से मना कर दिया क्योंकि इससे देश मे गलत मैसेज जाता।माना जाता जज को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
कांग्रेस व राहुल गांधी एसआईआर व वोट चोरी के मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कई बार यह कहकर वह सरकारी गवाह बन जाए,उन पर कार्रवाई नहीं की जाएगी, वह ऐसा नहीं करेंगे तो उन पर कार्रवाई होगी। यानी मुख्य चुनाव आयुक्त को डरा धमका कर प्रभावित करने का प्रयास तो किया ही गया है । ऐसे में सीजेआई उनसे मिल लेते तो माना तो यही जाता कि कांग्रेस ने उनको भी मिलकर प्रभावित करने का प्रयास किया।सीजेआई ने जब मिलने से मना कर दिया तो कांग्रेस व राहुल गांधी को दूसरी गलती सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने का फैसला नहीं करना था, मार्च करने के फैसले बदल देना था।लेकिन देश भर से कांग्रेस व गठबंधन के नेताओं को दिल्ली बुला लिए जाने के कारण कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने का फैसला किया और अब यह फैसला उसकी एक बड़ी गलती मानी जा रही है।भले ही कहा जाए कि यह मार्च ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे,एसआईआर के खत्म करने,कथित वोट चोरी के विरोध में निकाला गया था।
इससे भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिला और उसने उसे कांग्रेस की बडी गलती के रूप में प्रचारित किया।सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को भी यह ठीक नहीं लगा कि कोई राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाले।उसने तो इसका मतलब यह तक निकाला कि इस मार्च का मकसद तो सुप्रीम कोर्ट पर दबाव डालना था,सुप्रीम कोर्ट को डराना धमकाना था।यही वजह है कि वकीलों की ओर सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस के मार्च को लेकर याचिका दायर की गई और मांग की गई कि सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के आसपास जुलूस व विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने के लिए कुछ किया जाए। यानी कार्रवाई करने की मांग की गई।इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मार्च वाली याचिका पर दो टूक कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को कोई डरा धमका नहीं सकता,कोर्ट ने यह भी कहा कि अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण के बारे में पूछेंगे।सीजेआई का यह कहना भी एक तरह से कुछ लोगों के लिए संदेश है कि सुप्रीम कोर्ट दुनिया से अलग-थलग नहीं है,कोर्ट के भीतर व बाहर दिए जा रहे बयानों तथा घटनाओं से वह वाकिफ है।
सुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च को गंभीरता से लेना जरूरी था और राजनीतिक व गैरराजनीतिक संगठनों को यह संदेश देना जरूरी था कि वह सुप्रीम कोर्ट तक मार्च को गलत समझता है और उसे पसंद नहीं करता है, वह इसे गलत समझता है इसलिए ऐसा करनेवालों पर कार्रवाई भी कर सकता है।ऐसा पहली बार हुआ है इसलिए पहली बार वह भले ही वह लोगों माफी मांगने या स्पष्टीकरण देने के बाद माफ कर दे लेकिन भविष्य में कोई ऐसा करने की हिम्मत न करे इसलिए इस बार राजनीतिक व गैर राजनीतिक संगठनों को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कड़ा संदेश तो दिया ही जाना चाहिए।कडा़ संदेश नहीं दिया गया तो देश में अराजकता फैलाने वालों का हौसला बढ़ सकता है,अभी तो कुछ लोग कह रहे हैं कि हम रेजीम चेंज करना चाहते हैं, हम रेजीम चेंज करने के लिए यह सब कर रहे हैं, बाद में हो सकता है कि वह वाकई रेजीम चेंज करने के लिए चुनाव की जगह अराजकता का ही रास्ता चुन लें। 



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