2030 तक स्वच्छ ऊर्जा से 44 लाख नौकरियां, रूफटॉप सोलर बनेगा रोजगारदाता

Posted On:- 2026-06-03




नई दिल्ली (वीएनएस)। भारत का स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र आने वाले वर्षों में रोजगार सृजन का बड़ा केंद्र बन सकता है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) और नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल इंडिया (NRDC India) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने और नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के लक्ष्यों से 44 लाख से अधिक रोजगार (फुल-टाइम इक्विवेलेंट या FTE) सृजित हो सकते हैं। रिपोर्ट में रूफटॉप सोलर को सबसे बड़ा रोजगारदाता क्षेत्र बताया गया है, जिसकी कुल संभावित नौकरियों में लगभग 43 प्रतिशत हिस्सेदारी रहने का अनुमान है।

बुधवार को जारी रिपोर्ट ‘ड्राइविंग एनर्जी ट्रांजिशन: वर्कफोर्स, स्किल्स एंड जेंडर इन इंडिया’स रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर’ को नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के तकनीकी मार्गदर्शन में तैयार किया गया है। अध्ययन 2024-25 के दौरान सौर, पवन, जैव ऊर्जा और जलविद्युत क्षेत्रों की कंपनियों के सर्वेक्षण पर आधारित है।

स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से बढ़ा रोजगार
रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 के बीच चुनिंदा स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में 6.5 लाख से अधिक नए कामगार जुड़े हैं। इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी रूफटॉप सोलर क्षेत्र की रही, जिसने कुल रोजगार वृद्धि में 62 प्रतिशत योगदान दिया। इसके बाद पीएम-कुसुम योजना (16.3 प्रतिशत), जैव ऊर्जा (12.6 प्रतिशत) और ग्राउंड-माउंटेड सोलर परियोजनाओं (6 प्रतिशत) का स्थान रहा।

विशेषज्ञों के मुताबिक, रूफटॉप सोलर परियोजनाएं बड़े सौर पार्कों की तुलना में अधिक रोजगार पैदा करती हैं, क्योंकि इनमें साइट सर्वे, डिजाइनिंग, इंस्टॉलेशन, ग्रिड कनेक्शन और रखरखाव जैसे कार्यों के लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता होती है।

एक मेगावाट पर 44 गुना ज्यादा रोजगार
रिपोर्ट में कहा गया है कि रूफटॉप सोलर प्रति मेगावाट लगभग 45 एफटीई रोजगार-वर्ष सृजित करता है, जबकि ग्राउंड-माउंटेड सोलर परियोजनाएं प्रति मेगावाट केवल एक एफटीई और पवन ऊर्जा परियोजनाएं लगभग 0.6 एफटीई रोजगार-वर्ष उत्पन्न करती हैं। यानी रूफटॉप सोलर बड़े सौर प्रोजेक्ट्स की तुलना में 44 गुना अधिक रोजगार क्षमता रखता है।

भारत ने समय से पहले हासिल किया बड़ा लक्ष्य
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत दुनिया में कुल स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता के मामले में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। इतना ही नहीं, देश ने कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित समय से पांच वर्ष पहले, यानी 2025 में ही हासिल कर लिया है।

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने कहा कि हरित ऊर्जा परिवर्तन केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार, कौशल विकास और समावेशी आर्थिक वृद्धि का भी अवसर है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष भारत ने लगभग 51 गीगावाट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी और आने वाले वर्षों में यह रफ्तार और तेज होने की संभावना है।

महिलाओं की भागीदारी अब भी कम
रिपोर्ट में स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में लैंगिक असमानता की तस्वीर भी सामने आई है। सौर और पवन ऊर्जा क्षेत्रों के कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 11 प्रतिशत है। रूफटॉप सोलर में यह आंकड़ा 15 प्रतिशत, सोलर मॉड्यूल निर्माण में 13 प्रतिशत और फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं में 12 प्रतिशत है।

अध्ययन के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में कार्यरत 61 प्रतिशत महिलाएं तकनीकी कार्यों के बजाय मानव संसाधन, अकाउंटिंग और प्रशासन जैसी गैर-तकनीकी भूमिकाओं में कार्यरत हैं।

कौशल विकास पर देना होगा जोर
रिपोर्ट के मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में संचालन, रखरखाव और उपकरण निर्माण से जुड़े करीब 13 लाख दीर्घकालिक रोजगार सृजित हो सकते हैं। हालांकि, इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए बड़े पैमाने पर कुशल और अर्ध-कुशल कार्यबल तैयार करना होगा।

अध्ययन बताता है कि स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना से जुड़े लगभग 60 प्रतिशत रोजगारों के लिए तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है, जबकि उपकरण निर्माण क्षेत्र में यह मांग 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

रिपोर्ट ने दिए अहम सुझाव
रिपोर्ट में केंद्र सरकार और संबंधित संस्थानों को स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में कार्यबल की अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था विकसित करने, कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत बनाने और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विशेष नीतियां बनाने की सिफारिश की गई है।

सीईईडब्ल्यू के सीईओ डॉ. अरुणाभा घोष ने कहा कि भारत का ऊर्जा परिवर्तन केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि रोजगार परिवर्तन भी होना चाहिए। वहीं, एनआरडीसी इंडिया की कंट्री डायरेक्टर दीपा सिंह बगई ने कहा कि रूफटॉप सोलर जैसे विकेंद्रीकृत ऊर्जा मॉडल शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं।

रिपोर्ट के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि यदि नीति, कौशल और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए, तो भारत का स्वच्छ ऊर्जा अभियान केवल जलवायु लक्ष्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार का नया द्वार भी खोल सकता है।



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