13 या 14 अप्रैल, कब है वरुथिनी एकादशी? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Posted On:- 2026-04-12




-पंडित यशवर्धन पुरोहित

हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। हिंदू कैलैंडर के अनुसार, साल में कुल 24 एकादशी पड़ती है। ऐसे में हर मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी पड़ती है और हर एक एकादशी का अपना-अपना महत्व है। ऐसे ही वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को विशेष माना जाता है। इसे वरुथिनी एकादशी के नाम से जानते हैं। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ व्रत रखने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से कई तरह के पापों से मुक्ति मिल सकती है। इसके साथ ही भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार के कल्याण की प्राप्ति होती है।

वरुथिनी एकादशी तिथि 
द्रिक पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 13 अप्रैल को सुबह 1 बजकर 16 मिनट से आरंभ हो रही है, जो 14 अप्रैल को सुबह 1 बजकर 08 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में उदया तिथि के आधार पर वैशाख माह की पहली एकादशी यानी वरुथिनी एकादशी का व्रत 13 अप्रैल 2026, सोमवार को रखा जाएगा।

वरुथिनी एकादशी शुभ मुहूर्त 
पहला मुहूर्त अमृत-सर्वोत्तम –सुबह 05:58 बजे से लेकर 07:34 बजे तक
दूसरा मुहूर्त शुभ-उत्तम मुहूर्त- सुबह 09:10 बजे से लेकर 10:46 बजे तक
ब्रह्म मुहूर्त- 04:28 ए एम से 05:13 ए एम तक
अभिजीत मुहूर्त- 11:56 बजे से लेकर दोपहर 12:47 बजे तक

वरुथिनी एकादशी पारण का समय
वरुथिनी एकादशी व्रत का पारण 14 अप्रैल 2026 को किया जाएगा। इस दिन पारण का समय सुबह में 06 बजकर 54 मिनट से लेकर 08 बजकर 31 मिनट तक है।

वरुथिनी एकादशी पूजा विधि
वरुथिनी एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त या फिर सूर्योदय से पहले उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें और साफ वस्त्र धारण कर लें। अब एक तांबे के लोटे में जल, सिंदूर, अक्षत और लाल फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। अगर आप व्रत रख रहे हैं, तो भगवान विष्णु का मनन करते हुए एक फूल और थोड़ा अक्षत लेकर संकल्प लें। इसे फिर विष्णु जी को चढ़ा दें। अब पूजा आरंभ करें। सबसे पहले जल से आचमन करने के बाद पीला चंदन, फूल, माला, अक्षत के साथ भोग लगाएं। इसके बाद घी का दीपक और धूपबत्ती जला लें। फिर विष्णु मंत्र, वरुथिनी एकादशी व्रत कथा, विष्णु चालीसा आदि का पाठ करने के बाद अंत में आरती कर लें। इसके साथ भूलचूक के लिए माफी मांग लें। दिनभर फलाहारी व्रत रखें। इसके साथ ही शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण कर लें। प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत खोल लें।

भविष्यपुराण में वर्णित महात्म्य में इस श्लोक का उल्लेख मिलता है जिसमें स्वयं श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था।
भरताय युधिष्ठिरे भगवतः श्रीकृष्णेन उवाच —
“वषट्काशे वासरे कृष्णैकादशी तिथौ समागता।
वरुथिनी नाम विधेयसी विष्णुप्रीत्या महात्मना।
यस्येति श्रृणु सर्वपापानि क्षीयन्ते न संशयः।
अद्वैतसुखं च लभते यः पालयेत् तपसा सह॥”

अर्थ:
हे युधिष्ठिर! इस वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का नाम वरुथिनी है। ये एकादशी भगवान विष्णु को अति प्रिय है। इस व्रत को रखने से विष्णु की कृपा से प्रतिष्ठित तथा सभी पापों का नाश मिल सकती है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ रखने से संसारिक दुःखों से मुक्त होकर सत्य सुख को प्राप्त होता है।

श्री विष्णु मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमो नारायणाय।
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्ण शुभांगम्। लक्ष्मीकांत कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्व लौकेक नाथम्।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवा देवा।
ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।

विष्णु जी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय…॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥



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